अलीगंज कला स्रोत आर्ट गैलरी में बायस्कोप-2 का आयोजन भारतीय सिनेमा के अनछुए पहलुओं और पुरानी यादों को सहेजने के उद्देश्य से राजधानी के अलीगंज इलाके में स्थित प्रतिष्ठित कला स्रोत आर्ट गैलरी में बायस्कोप-2 प्रदर्शनी का भव्य तरीके से शुभारंभ किया गया है। इस विशेष आयोजन के दौरान दर्शकों को फिल्म जगत के शुरुआती दौर की कई ऐसी दुर्लभ चीजें देखने को मिल रही हैं जो आज की पीढ़ी के लिए बिल्कुल नई और अनोखी हैं। इस प्रदर्शनी में हिंदी सिनेमा के शुरुआती सफर से जुड़े पुराने किस्से, ऐतिहासिक दस्तावेज और कई ऐसी दुर्लभ फिल्में व सामग्रियां शामिल की गई हैं जो सिनेमा प्रेमियों के बीच खासी चर्चा का विषय बनी हुई हैं। गैलरी के भीतर इस अनूठे आयोजन को देखने के लिए विभिन्न क्षेत्रों से लोग पहुंच रहे हैं और पर्दे के पीछे के इतिहास को बेहद करीब से महसूस कर रहे हैं।
सिनेमाई इतिहास को सहेजने का अनूठा सांस्कृतिक प्रयास इस प्रकार की प्रदर्शनियां भारतीय फिल्म उद्योग की लंबी विकास यात्रा को समझने और उसे आम जनता तक पहुंचाने का एक बेहतरीन माध्यम साबित होती हैं। जब नई पीढ़ी आधुनिक तकनीक और डिजिटल फॉर्मेट में फिल्में देखती है, तब ऐसे आयोजनों के जरिए उन्हें यह पता चलता है कि हमारे देश में फिल्म निर्माण की शुरुआत किन कठिन परिस्थितियों और सीमित संसाधनों के बीच हुई थी। इस तरह के सांस्कृतिक और कलात्मक आयोजनों से न केवल स्थानीय कलाकारों और इतिहास प्रेमियों को प्रोत्साहन मिलता है, बल्कि शहर की सांस्कृतिक गतिविधियों में भी एक नया और सकारात्मक आयाम जुड़ता है। इस आयोजन के माध्यम से पुरानी फिल्मों के तकनीक, संगीत, पोस्टर डिजाइन और कलाकारों के संघर्ष की कहानियों को सहेजने का जो प्रयास किया गया है, वह वास्तव में सराहनीय है और यह आने वाले समय में फिल्म अध्ययन के छात्रों के लिए भी काफी उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
दर्शकों की भारी भीड़ और भविष्य की संभावनाएं बायस्कोप-2 प्रदर्शनी के शुरू होने के बाद से ही कला प्रेमियों और सिनेमा जगत से जुड़े लोगों की आवाजाही लगातार बनी हुई है, जिससे आयोजकों का उत्साह भी काफी बढ़ गया है। लोग पुरानी फिल्मों के किस्सों को बड़े चाव से सुन रहे हैं और दुर्लभ तस्वीरों व वीडियो क्लिपिंग को अपने कैमरों में कैद कर रहे हैं। इस प्रकार की प्रदर्शनियों के सफल आयोजन से यह स्पष्ट होता है कि आज भी समाज में पारंपरिक और क्लासिक सिनेमा के प्रति गहरा लगाव मौजूद है। भविष्य में इस तरह के और अधिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन की उम्मीद की जा रही है, जो स्थानीय स्तर पर कला और सिनेमा के इतिहास के प्रति जागरूकता फैलाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। आयोजकों और उपस्थित दर्शकों का मानना है कि ऐसे आयोजनों का सिलसिला लगातार जारी रहना चाहिए ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां अपनी समृद्ध सिनेमाई विरासत से हमेशा जुड़ी रहें।