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कला की कोई सीमा नहीं: शबाना आजमी ने सनी देओल के मुस्लिम किरदारों को लेकर उठाया अहम सवाल

बॉलीवुड की दिग्गज अभिनेत्री शबाना आजमी ने सिनेमा जगत में किरदारों और अभिनेताओं की पृष्ठभूमि को लेकर एक गंभीर सवाल उठाया है। उन्होंने अभिनेता सनी देओल के माध्यम से यह बात रखी है कि कलाकारों को उनकी व्यक्तिगत पहचान के आधार पर भूमिकाएं मिलने से क्यों रोका जाना चाहिए।

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Ankit Yadav
29 अग 2026, 12:11
कला की कोई सीमा नहीं: शबाना आजमी ने सनी देओल के मुस्लिम किरदारों को लेकर उठाया अहम सवाल
भारतीय सिनेमा के गलियारों में अक्सर कला, संस्कृति और अभिनेताओं की भूमिकाओं को लेकर तीखी बहस देखने को मिलती है। इसी बीच जानी-मानी अभिनेत्री शबाना आजमी ने एक बड़ा बयान देते हुए फिल्म उद्योग के भीतर प्रचलित धारणाओं पर करारा कटाक्ष किया है। उन्होंने खुलकर यह बात कही है कि आखिर क्यों कोई कलाकार अपनी निजी पहचान या धार्मिक पृष्ठभूमि के कारण किसी विशेष प्रकार का किरदार निभाने से वंचित रह जाए। इस विषय पर उन्होंने वरिष्ठ अभिनेता अमिताभ बच्चन का भी उदाहरण दिया, जिन्होंने अपने लंबे और शानदार फिल्मी सफर में हर तरह की भूमिकाओं को बखूबी जिया है और अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दिया है।

सिनेमा में रूढ़िवादिता और कलाकारों की स्वतंत्रता

शबाना आजमी के इस बयान के बाद फिल्म समीक्षकों और आम दर्शकों के बीच भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। उनका यह दृष्टिकोण इस बात पर जोर देता है कि अभिनय कला किसी एक खांचे में फिट बैठने के लिए नहीं बनी है। एक अभिनेता का मुख्य उद्देश्य विभिन्न प्रकार के पात्रों को पूरी शिद्दत के साथ पर्दे पर उतारना होता है, चाहे वह किरदार किसी भी पृष्ठभूमि या संस्कृति से ताल्लुक रखता हो। अतीत में भी कई कलाकारों ने इस प्रकार की सीमाओं को तोड़ा है और दर्शकों ने उन्हें सराहा भी है। आज के समय में जब दर्शक अधिक परिपक्व हो चुके हैं, ऐसी बहसों का होना भारतीय सिनेमा के विकास के लिए बेहद आवश्यक माना जा रहा है।

अमिताभ बच्चन के उदाहरण से समझी गई बात

अपने इस विचार को पुख्ता करते हुए उन्होंने मेगास्टार अमिताभ बच्चन के किरदारों का हवाला दिया। अमिताभ बच्चन ने अपने करियर में अनगिनत ऐसे किरदार निभाए हैं जो उनकी अपनी व्यक्तिगत पहचान से बिल्कुल अलग थे और उन्होंने हर बार अपनी बेहतरीन अदायगी से दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी। शबाना आजमी का मानना है कि इसी तर्ज पर बाकी कलाकारों को भी बिना किसी पूर्वाग्रह के हर तरह की भूमिकाएं मिलने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। चाहे वह कोई ऐतिहासिक चरित्र हो या फिर किसी खास समुदाय से जुड़ा हुआ काल्पनिक पात्र, कलाकार की योग्यता ही उसका सबसे बड़ा प्रमाण होनी चाहिए। भविष्य में इस तरह की चर्चाओं से फिल्म निर्माताओं और लेखकों की सोच पर भी गहरा प्रभाव पड़ने की उम्मीद है। इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि इस प्रकार के मुद्दों पर खुलकर बात होने से कहानियों के चयन में और अधिक विविधता और संवेदनशीलता आएगी। दर्शक भी अब लीक से हटकर बनी कहानियों और प्रयोगधर्मी सिनेमा को ज्यादा पसंद कर रहे हैं। शबाना आजमी का यह बयान आने वाले दिनों में और भी कई मंचों पर बहस का केंद्र बन सकता है, जिससे भारतीय फिल्म उद्योग में कलाकारों के चयन को लेकर एक नई और सकारात्मक दिशा मिलने की पूरी संभावना है।
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