शूटिंग के दौरान मजदूरों की समस्या
दिसंबर 2000 की बात है जब उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में आंच नाम की फिल्म की शूटिंग चल रही थी। उस समय इलाहाबाद के रहने वाले रंगकर्मी अनिल रंजन भौमिक भी इस फिल्म का हिस्सा थे और वे अभिनेता नाना पाटेकर के सह-कलाकार के रूप में कार्य कर रहे थे। फिल्म की पूरी निर्माण इकाई लगभग बीस वाहनों के काफिले में प्रतिदिन बनारस से गाजीपुर आती-जाती थी। शूटिंग का यह सिलसिला पूरे दो महीने तक चलता रहा था। अचानक एक दिन स्थिति उस समय तनावपूर्ण हो गई जब इन गाड़ियों के चालकों ने अपना पारिश्रमिक न मिलने के कारण शूटिंग स्थल पर ले जाने से साफ मना कर दिया। जब यह बात नाना पाटेकर को पता चली, तो उन्होंने तुरंत उस दिन की पूरी शूटिंग को स्थगित करने का निर्णय लिया। उनके इस फैसले से वहां मौजूद सभी लोगों को उनके संवेदनशीलता का अहसास हुआ और यह स्पष्ट हो गया कि वे गरीब और मेहनतकश तबकों की मदद करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं।
नाना पाटेकर का सहानुभूति पूर्ण व्यवहार
फिल्म यूनिट के श्रमिकों के प्रति नाना पाटेकर का यह व्यवहार केवल उस एक दिन तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि यह उनके चरित्र की एक बड़ी पहचान बन गया। जिस दिन शूटिंग को रद्द किया गया था, उस विशेष दृश्य को नाना ने बाद में मुंबई जाकर पूरा करवाया था। शूटिंग पूरी करने के लिए उन्होंने खुद अनिल रंजन भौमिक को फोन करके मुंबई बुलाया था। इस घटना के बाद नाना और अनिल के बीच एक गहरे पारिवारिक रिश्ते की शुरुआत हुई, जो नाना की मृत्यु के अंतिम समय तक कायम रही। अनिल बताते हैं कि नाना पाटेकर के भीतर मानवीय संवेदनाओं का भंडार था और वे अपने आसपास के लोगों का बहुत ख्याल रखते थे। उन्होंने आर्थिक तंगी से जूझ रहे मजदूरों की आवाज बनने में कोई संकोच नहीं किया और फिल्म की शूटिंग के दौरान उनके अधिकारों की रक्षा की। उनका यह व्यक्तित्व सेट पर मौजूद हर छोटे-बड़े व्यक्ति के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया था।
सालों पुराना रिश्ता और बाद की घटनाएं
नाना पाटेकर और अनिल रंजन भौमिक के बीच बना यह रिश्ता वर्षों तक एक मजबूत बंधन की तरह बना रहा। कोरोना काल की पहली लहर के दौरान जब अनिल अपनी बेटी के पास पुणे में रह रहे थे, तब उन्हें अस्पताल में एक अत्यंत आवश्यक इंजेक्शन की जरूरत महसूस हुई। उस कठिन दौर में जब इलाहाबाद से लेकर मुंबई तक के लोगों ने मदद करने से हाथ खड़े कर दिए थे, तब नाना पाटेकर को इसकी जानकारी मिली। उन्होंने केवल आधे घंटे के भीतर ही डॉक्टर से बात करके वह इंजेक्शन उपलब्ध करवा दिया था, जो अनिल के लिए एक बड़ी राहत साबित हुई। उनके बीच का यह अपनत्व अंत तक बना रहा और वर्ष 2025 में गणेश महोत्सव के दौरान नाना ने अनिल को पुणे स्थित अपने फार्म हाउस पर आमंत्रित किया था। वहां उन्होंने बड़ी आत्मीयता के साथ अपने पुराने साथी के साथ समय बिताया और संबंधों का निर्वहन किया। यह कहानी केवल एक शूटिंग का किस्सा नहीं बल्कि एक अभिनेता की इंसानियत का प्रमाण है।