सिनेमा गलियारों में हाल ही में सामने आए घटनाक्रम के अनुसार, आगामी ऑस्कर पुरस्कारों के लिए भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में चुनी जाने वाली फिल्मों की प्रक्रिया में बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। रणवीर सिंह अभिनीत फिल्म धुरंधर, जिसे लेकर ट्रेड एनालिस्ट्स और प्रशंसकों के बीच काफी उम्मीदें लगाई जा रही थीं, अंतिम चयन प्रक्रिया के दौरान रेस से बाहर हो गई। इसके विपरीत, गोंधल नामक शीर्षक ने निर्णायक मंडल का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हुए बाजी मार ली और इस प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मंच के लिए अपना स्थान सुरक्षित कर लिया। इस फैसले के बाद से ही फिल्म उद्योग के भीतर और सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर इस बात को लेकर गहन समीक्षा की जा रही है कि आखिर चयन समिति ने किन पैमानों के आधार पर यह निर्णय लिया और किस वजह से धुरंधर इस वैश्विक दौड़ से पीछे छूट गई।
इस पूरी चयन प्रक्रिया और उससे जुड़ी पृष्ठभूमि पर यदि नजर डालें तो भारतीय सिनेमा से हर साल ऑस्कर की श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय फीचर फिल्म के लिए प्रविष्टि भेजने की एक लंबी और कड़ा मुकाबला तय करने वाली परंपरा रही है। विभिन्न जॉनर की फिल्मों को शॉर्टलिस्ट करने के लिए फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया या संबंधित चयन समितियों द्वारा एक पैनल का गठन किया जाता है, जो कलात्मक उत्कृष्टता, कहानी कहने की अनूठी शैली, पटकथा के स्तर, तकनीकी कसावट और वैश्विक दर्शकों के बीच फिल्म की प्रासंगिकता जैसे तमाम महत्वपूर्ण बिंदुओं पर बारीकी से विचार-विमर्श करता है। रणवीर सिंह की धुरंधर अपनी स्टार पावर और कमर्शियल अपील के बावजूद शायद उन कसौटियों पर पूरी तरह खरा नहीं उतर पाई जो इस प्रकार के अंतरराष्ट्रीय मंचों के लिए जरूरी माने जाते हैं। दूसरी ओर, गोंधल ने अपनी विषय-वस्तु, सांस्कृतिक गहराई और ट्रीटमेंट के बलबूते चयनकर्ताओं को प्रभावित करने में सफलता हासिल की, जिसके चलते इस फिल्म को ऑस्कर की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में चुना गया।
इस महत्वपूर्ण फैसले के बाद भारतीय सिनेमा जगत में भविष्य की रणनीतियों और अंतरराष्ट्रीय फलक पर फिल्मों के चयन को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। फिल्म समीक्षकों का मानना है कि इस प्रकार के परिणाम मुख्यधारा के बड़े सितारों वाली फिल्मों और लीक से हटकर बनाई जाने वाली विषय-प्रधान कलात्मक फिल्मों के बीच के संतुलन को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। हालांकि धुरंधर के इस दौड़ से बाहर होने से इसके निर्माताओं और प्रशंसकों को अवश्य निराशा हुई होगी, लेकिन गोंधल का ऑस्कर के मैदान में उतरना यह साबित करता है कि आज का चयन मंडल केवल लोकप्रिय नामों के बजाय कहानी के दम और उसकी प्रस्तुति को प्राथमिकता दे रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि यह फिल्म अंतरराष्ट्रीय जूरी के सामने किस प्रकार प्रतिस्पर्धा करती है और वैश्विक मंच पर भारतीय सिनेमा का प्रतिनिधित्व करते हुए देश की झोली में क्या सफलता लेकर आती है।