सिनेमाघरों में दिखा अनूठा नजारा और सांस्कृतिक जुड़ाव
बिहार की लोक परंपराओं और छठ पूजा की आस्था के इर्द-गिर्द घूमने वाली फिल्म द वन गत 25 सितंबर को बड़े पर्दे पर रिलीज की गई थी। इस फिल्म को समीक्षकों की तरफ से भले ही मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली हो, लेकिन आम दर्शकों ने इसे बहुत पसंद किया है। सिनेमाघरों के अंदर फिल्म का प्रदर्शन देखने पहुंचे कई दर्शक इतने भावुक हो गए कि उनकी आंखें नम हो गईं। कुछ दर्शक तो फिल्म के पोस्टर के सामने हाथ जोड़कर सिर झुकाते हुए भी नजर आए। अपनी माटी और संस्कृति से जुड़ाव का यह अनूठा उदाहरण राज्य के विभिन्न सिनेमाघरों के बाहर देखने को मिला है। लोग इस कलाकृति से मानसिक रूप से इस प्रकार जुड़ चुके हैं कि उन्होंने अपनी लोक संस्कृति को सिनेमाघर के बाहर भी जीवंत कर दिया। इंटरनेट पर प्रसारित हो रहे एक वीडियो में साफ दिखाई दे रहा है कि फिल्म के शो के बाद दर्शक बाहर ठेकुआ बांट रहे हैं। इस वीडियो को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर काफी पसंद किया जा रहा है और लोग इस पर अपनी तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। घर के हाथ का बना हुआ ठेकुआ पाकर दर्शक छठ पूजा जैसी पवित्र भावनाओं का अनुभव कर रहे हैं।
बॉक्स ऑफिस पर शानदार कमाई और दर्शकों की जबरदस्त भीड़
सुपरनैचुरल और पौराणिक कथाओं पर आधारित इस फिल्म ने सिनेमाघरों में अपने प्रदर्शन के एक हफ्ते के भीतर ही बॉक्स ऑफिस पर हाफ सेंचुरी पूरी कर ली है। फिल्म ने 1 अक्टूबर को घरेलू बॉक्स ऑफिस पर चार करोड़ रुपये का कारोबार सफलतापूर्वक कर लिया है। इस तरह से मात्र सात दिनों के भीतर इस फिल्म की कुल कमाई तिरानवे करोड़ के आंकड़े के बेहद करीब पहुंच चुकी है। फिल्म निर्माताओं को अब गांधी जयंती के अवसर के साथ-साथ शनिवार और रविवार के आने वाले अवकाश से खासी उम्मीदें हैं। इन छुट्टियों के दिनों में टिकट खिड़की पर फिल्म की कमाई में और अधिक उछाल आने की पूरी संभावना जताई जा रही है। दर्शक बड़ी संख्या में सिनेमाघरों का रुख कर रहे हैं और परिवार के साथ इस लोक संस्कृति से ओतप्रोत फिल्म को देखने पहुंच रहे हैं। फिल्म के मुख्य कलाकारों और इसके निर्माण से जुड़े लोगों के लिए यह सफलता काफी उत्साहजनक साबित हो रही है। बॉक्स ऑफिस के इन आंकड़ों ने यह साबित कर दिया है कि ग्रामीण परिवेश और पारंपरिक मान्यताओं पर बनी फिल्मों को दर्शक अपना भरपूर समर्थन दे रहे हैं। टिकट खिड़की पर लगातार मिल रहे इस मजबूत समर्थन से फिल्म जगत के जानकारों को भी काफी हैरानी हुई है।
पारंपरिक संस्कृति और आस्था का अनूठा संगम बना फिल्म
इस फिल्म की पटकथा को जिस तरह से बिहार की लोक संस्कृति और छठ पूजा की पवित्र आस्था के साथ पिरोया गया है, उसने दर्शकों के दिलों को गहराई से छू लिया है। सिनेमाघरों के बाहर ठेकुआ बांटने की यह परंपरा इस बात का प्रमाण है कि दर्शक फिल्म को केवल एक मनोरंजन का साधन नहीं मान रहे हैं। वे इसे अपनी सांस्कृतिक पहचान के एक हिस्से के रूप में अपना रहे हैं और सिनेमा हॉल के प्रांगण को ही अपनी परंपरा का मंच बना रहे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले इस वीडियो ने ऑनलाइन मंचों पर एक अलग ही बहस और चर्चा को जन्म दे दिया है। लोग इस बात की चर्चा कर रहे हैं कि किस प्रकार एक कलाकृति आम जनमानस की गहरी भावनाओं को इस हद तक झकझोर सकती है। इस प्रकार का सांस्कृतिक जुड़ाव भारतीय सिनेमा के इतिहास में बहुत कम देखने को मिलता है जहां दर्शक पर्दे की कहानी को अपनी असल जिंदगी का हिस्सा मान लेते हैं। आने वाले दिनों में यह फिल्म और कितने नए रिकॉर्ड बनाती है, इस पर पूरे उद्योग जगत की पैनी नजर बनी हुई है। पारंपरिक मूल्यों को आधुनिक माध्यम से परोसने का यह सफल प्रयोग भविष्य की अन्य फिल्मों के लिए भी एक बड़ा उदाहरण बन गया है।