सरकार की ओर से केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सीबीएफसी को सौंपी गई नई गाइडलाइन के तहत फिल्मों में हिंसा, अक्रामकता, और राष्ट्र-विरोधी भावनाओं को दर्शाने वाले दृश्यों पर बेहद कड़ी नजर रखी जाएगी। इन पांच नए नियमों का मुख्य उद्देश्य सिनेमाई सामग्री में सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाले या देश की संप्रभुता को चुनौती देने वाले पहलुओं पर पूरी तरह नकेल कसना है। इस दिशा में सेंसर बोर्ड को अधिक अधिकार दिए गए हैं ताकि वह रिलीज से पहले ही ऐसी सामग्री की सूक्ष्मता से जांच कर सके। इस औचक और सख्त नीतिगत बदलाव का सीधा असर अब कई बड़ी आगामी फिल्मों पर पड़ता दिखाई दे रहा है, जिसमें बॉलीवुड के दबंग स्टार सलमान खान की आगामी फिल्म 'मातृभूमि' भी शामिल है। इस नई व्यवस्था के लागू होने के बाद इस प्रोजेक्ट को लेकर भी मुश्किलें खड़ी हो गई हैं और बोर्ड के स्तर पर इसके तमाम पहलुओं की नए सिरे से समीक्षा की जा रही है।
इस तरह के नीतिगत बदलावों का सिलसिला कोई नया नहीं है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में सिनेमाई और डिजिटल सामग्री पर नियंत्रण को लेकर सरकार लगातार सक्रिय रही है। सीबीएफसी पर अक्सर यह दबाव रहता है कि वह ऐसी फिल्मों को पास न होने दे जो किसी भी तरह से विवादों को जन्म दें या फिर सामाजिक व राष्ट्रीय ताने-बाने को प्रभावित करें। हाल के महीनों में कई फिल्मों को लेकर उठे विवादों के बाद से ही यह कयास लगाए जा रहे थे कि सेंसर बोर्ड के नियमों को और अधिक कड़ा किया जा सकता है। सलमान खान की फिल्मों का हमेशा से बड़ा दर्शक वर्ग रहा है और उनके प्रोजेक्ट्स को लेकर व्यापारिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर काफी चर्चा रहती है। ऐसे में 'मातृभूमि' जैसी फिल्मों का इन नए और कड़े मानदंडों के घेरे में आना इस बात का संकेत है कि अब फिल्म निर्माताओं को अपनी पटकथा और दृश्यों को लेकर बेहद सतर्क रहना होगा। सेंसर बोर्ड की यह सख्ती न केवल बड़े बजट की फिल्मों को प्रभावित कर रही है, बल्कि पूरी फिल्म इंडस्ट्री के लिए काम करने के तौर-तरीकों को भी बदल रही है।
आने वाले समय में इन पांच नए नियमों का असर पूरे फिल्म उद्योग पर व्यापक रूप से देखने को मिलेगा, क्योंकि निर्माताओं को अपनी फिल्मों को हरी झंडी दिलवाने के लिए बोर्ड की कड़ी शर्तों का पालन करना अनिवार्य होगा। जानकारों का मानना है कि इससे कई फिल्मों की रिलीज डेट आगे खिसक सकती है या फिर निर्माताओं को अपनी फिल्मों के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर काट-छांट करनी पड़ सकती है। सलमान खान के प्रोजेक्ट 'मातृभूमि' के संदर्भ में भी अब यही कयास लगाए जा रहे हैं कि फिल्म की टीम को बोर्ड की नई आपत्तियों को दूर करने के लिए विशेष प्रयास करने होंगे। हालांकि, दूसरी ओर दर्शकों और फिल्म प्रेमियों के बीच इस बात को लेकर भी बहस छिड़ गई है कि इस तरह के कड़े नियम कहीं न कहीं रचनात्मक स्वतंत्रता को सीमित करते हैं। कुल मिलाकर, सीबीएफसी की यह नई गाइडलाइन आने वाले दिनों में फिल्म निर्माण, सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच के संतुलन को तय करने में एक बड़ा मोड़ साबित होने जा रही है।