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सिनेमाई सफर का नया पड़ाव: उपकार से लेकर धुरंधर तक देशभक्ति के अंदाज में आया बड़ा बदलाव
स्वतंत्रता दिवस के इस खास मौके पर हिंदी सिनेमा में राष्ट्रवाद और देशभक्ति की फिल्मों के बदलते स्वरूप पर एक विहंगम नजर डाली जा रही है.
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Kantap News डेस्क
16 अग 2026, 18:50
भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर से लेकर आज के आधुनिक समय तक फिल्मों में देश प्रेम को दिखाने का तरीका पूरी तरह से बदल चुका है। दशकों पहले जब मनोज कुमार की फिल्म उपकार जैसी कृतियां पर्दे पर आती थीं, तो उनमें राष्ट्रभक्ति का मुख्य स्वर एक अलग तरह की कसक, सामाजिक चुनौतियों के खिलाफ मुखर बगावत और व्यवस्था की कमियों को सुधारने की ललक पर आधारित होता था। उस दौर की फिल्मों के नायक अक्सर आम आदमी की पीड़ा को अपनी आवाज बनाते थे और देश के भीतर की विसंगतियों पर सीधा सवाल खड़े करते हुए अपनी मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना को परवान चढ़ाते थे। यह वह दौर था जब सिनेमा समाज के जख्मों को कुरेदकर देशभक्ति की एक नई परिभाषा गढ़ने का प्रयास कर रहा था और दर्शक इन कहानियों के साथ खुद को गहराई से जुड़ा हुआ महसूस करते थे। समय के पहिए ने करवट ली और धीरे-धीरे फिल्मों में राष्ट्रवाद का यह विद्रोही तेवर गर्व और आत्मसम्मान के मजबूत भाव में तब्दील होने लगा। आज की आधुनिक फिल्मों जैसे धुरंधर जैसी प्रस्तुतियों में देश की ताकत, उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और सीमाओं पर तैनात सुरक्षा बलों के अदम्य साहस को एक अलग ही गौरव के साथ दिखाया जाता है। अब कहानियां सिर्फ व्यवस्था की कमियों पर सवाल नहीं उठातीं, बल्कि देश की उपलब्धियों और उसकी सांस्कृतिक अस्मिता का जश्न मनाती हैं। इस प्रकार हिंदी सिनेमा में देशभक्ति का दायरा विरोध और संघर्ष के दौर से निकलकर पूरी तरह से गर्व और स्वाभिमान के अहसास में ढल चुका है, जो आज के दर्शकों के मन में एक नया जोश भर रहा है।
सैनिकों और नायकों के त्याग की दास्तान
भारतीय रजत पट पर हमेशा से ही उन अनगिनत वीरों और साहसी नायकों की कहानियों को प्रमुखता से स्थान मिला है जिन्होंने देश की खातिर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। स्वतंत्रता दिवस के इस पावन पर्व पर हमें उन सभी किरदारों को भी याद करना चाहिए जिन्होंने परदे पर राष्ट्र के लिए प्राणों की आहुति देने वाले सेनानियों के संघर्ष को जीवंत किया है। चाहे वह इतिहास के पन्नों से जुड़े गुमनाम नायक हों या आधुनिक इतिहास के वीर योद्धा, बॉलीवुड की विभिन्न फिल्मों ने हमेशा से यह सुनिश्चित किया है कि आने वाली पीढ़ियां हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों से भली-भांति परिचित रहें। इन फिल्मों में दिखाया गया त्याग और समर्पण केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा दस्तावेज है जो हर भारतीय के दिल में देश के प्रति कर्तव्य बोध को जागृत करता है। समय-समय पर आने वाली ऐसी कलाकृतियां यह साबित करती हैं कि सिनेमा समाज का सच्चा दर्पण होता है, जो इतिहास की सच्ची घटनाओं को कलात्मकता के साथ पिरोकर हमारे सामने रखता है। आज के समय में जब दर्शक सिनेमाघरों का रुख करते हैं, तो वे केवल एक्शन या मेलोड्रामा नहीं बल्कि ऐसी प्रेरक कहानियां देखना चाहते हैं जो उनके भीतर छिपी राष्ट्रभक्ति की भावना को और अधिक प्रदीप्त कर सकें।
संगीत और संवादों का अमिट प्रभाव
देशभक्ति की बात हो और उन शानदार गीतों तथा दमदार संवादों का जिक्र न हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता जिन्होंने पीढ़ियों से देशवासियों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी है। हिंदी सिनेमा में ऐसे अनगिनत नगमे और पंक्तियां मौजूद हैं जो आज भी लोगों की जुबान पर रटे हुए हैं और जब भी वे इन्हें सुनते हैं, उनके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इन गीतों की धुनें और संवाद केवल कुछ शब्द मात्र नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसी ऊर्जा का संचार करते हैं जो हर जाति, धर्म और वर्ग के इंसान को एक सूत्र में पिरो देती है। यही कारण है कि स्वतंत्रता दिवस के खास आयोजनों से लेकर आम दिनों तक जब भी ये धुनें गूंजती हैं, तो पूरा देश एक नई उमंग और उत्साह से भर जाता है। सिनेमाई सफर का यह खूबसूरत पहलू यह बयां करता है कि कला और संगीत के माध्यम से किस प्रकार राष्ट्र प्रेम की अलख को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखा जा सकता है। आने वाले समय में भी भारतीय फिल्म उद्योग अपनी इन महान परंपराओं को आगे बढ़ाते हुए दर्शकों के सामने ऐसी ही प्रेरणादायक प्रस्तुतियां लाता रहेगा, जो हमारी राष्ट्रीय एकता को और अधिक मजबूत करने का काम करेंगी।