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कृषि विज्ञान का कमाल: राजस्थान के मरुस्थल में उगाई गई विश्व की सबसे मीठी खजूर की नई संकर किस्म

राजस्थान के जैसलमेर जिले के वैज्ञानिकों और किसानों ने मिलकर एक ऐसी खजूर की नई संकर किस्म विकसित की है जो अत्यंत कम पानी में भी रिकॉर्ड पैदावार और अभूतपूर्व मिठास देती है।

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Kantap News डेस्क
18 अग 2026, 13:55
कृषि विज्ञान का कमाल: राजस्थान के मरुस्थल में उगाई गई विश्व की सबसे मीठी खजूर की नई संकर किस्म
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सहयोग से जैसलमेर के सीमावर्ती क्षेत्र में किए गए वर्षों के शोध के बाद आखिरकार कृषि वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता हाथ लगी है। वैज्ञानिकों ने 'मरु-सुधा' नाम से खजूर की एक ऐसी उन्नत संकर किस्म विकसित की है, जो न केवल थार मरुस्थल की भीषण गर्मी और सूखे को आसानी से सहन कर सकती है, बल्कि इसके फलों में मिठास की मात्रा पारंपरिक किस्मों की तुलना में लगभग तीस प्रतिशत अधिक पाई गई है। इस परियोजना से जुड़े मुख्य कृषि विज्ञानी डॉ. रमेश चंद्र शर्मा ने बताया कि इस किस्म को तैयार करने में पारंपरिक ड्रिप सिंचाई तकनीक के साथ-साथ अत्याधुनिक जैव-उर्वरकों का उपयोग किया गया है, जिससे पौधे को बेहद कम नमी में भी भरपूर पोषण मिलता है। इस वर्ष के शुरुआती परीक्षणों में एक ही पेड़ से औसतन डेढ़ क्विंटल तक उच्च गुणवत्ता वाले खजूर प्राप्त हुए हैं, जिन्हें स्थानीय बाजार में हाथों-हाथ खरीदा जा रहा है। इस सफलता से क्षेत्र के किसानों की आजीविका में सुधार लाने के नए द्वार खुल गए हैं, क्योंकि बंजर भूमि पर भी अब बंपर पैदावार संभव हो सकी है। राज्य सरकार ने भी इस अभिनव प्रयोग को देखते हुए किसानों के लिए विशेष अनुदान योजना की घोषणा की है, ताकि अधिक से अधिक लोग इस फसल को अपनाने के लिए आगे आ सकें।

वैज्ञानिक अनुसंधान और पैदावार के आंकड़े

इस अनोखी कृषि सफलता के पीछे पांच वर्षों का कड़ा परिश्रम और कई वैज्ञानिक परीक्षण छिपे हैं। अनुसंधान टीम ने मध्य पूर्व के देशों से लाई गई कुछ विशिष्ट प्रजातियों का भारतीय जलवायु के अनुकूल संकरण कराया, जिससे यह नई रोधी किस्म अस्तित्व में आई। प्रयोगशाला परीक्षणों में यह बात सामने आई कि 'मरु-सुधा' खजूर में पोटेशियम, मैग्नीशियम और प्राकृतिक शर्करा का संतुलन इस प्रकार है कि यह मधुमेह रोगियों के लिए भी सीमित मात्रा में सेवन करने योग्य हो सकता है। इसके पौधे रोपण के मात्र तीसरे वर्ष से ही फल देना शुरू कर देते हैं, जो किसानों के लिए कम समय में अधिक लाभ कमाने का एक बेहतरीन जरिया बन रहा है। कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि इस खजूर की शेल्फ लाइफ भी अन्य किस्मों से काफी बेहतर है, जिसके कारण बिना किसी महंगे शीतगृह के इसे लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इन सभी खूबियों के चलते देश के अन्य सूखाग्रस्त राज्यों जैसे गुजरात और हरियाणा के कृषि प्रतिनिधि भी इस तकनीक को सीखने के लिए जैसलमेर का दौरा कर रहे हैं।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव और निर्यात की संभावनाएं

इस नई खजूर की किस्म के आने से थार क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक क्रांतिकारी बदलाव देखा जा रहा है। पारंपरिक बाजरा और ग्वार की खेती पर निर्भर रहने वाले किसानों को अब एक उच्च मूल्य वाली नकदी फसल मिल गई है, जिससे उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है। स्थानीय किसान संगठनों ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा है कि यह न केवल मरुस्थलीकरण को रोकने में मददगार साबित होगी बल्कि ग्रामीण युवाओं को कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीक अपनाने के लिए प्रेरित करेगी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी इस किस्म की मांग को देखते हुए राज्य के सहकारिता विभाग ने इसका बड़े पैमाने पर निर्यात करने की योजना तैयार की है। आने वाले त्योहारी सीजन में इन खजूरों को विशेष पैकेजिंग के साथ देश के महानगरों के बाजारों में उतारा जाएगा, जिससे राजस्थान के किसानों को उनकी मेहनत का सही और उचित मूल्य मिल सके।
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