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घरेलू जुगाड़: मात्र 5-10 रुपये की रबड़ से फिर सक्रिय हो सकते हैं रिमोट और माउस के सेल

अक्सर घरों में रिमोट या कंप्यूटर माउस के सेल डिस्चार्ज होने पर उन्हें बेकार समझकर कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है, लेकिन अब एक बहुत ही आसान और बेहद किफायती तरीके से उन्हें दोबारा इस्तेमाल में लाया जा सकता है।

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Ankit Yadav
13 सित 2026, 19:39
घरेलू जुगाड़: मात्र 5-10 रुपये की रबड़ से फिर सक्रिय हो सकते हैं रिमोट और माउस के सेल
दैनिक जीवन में उपयोग होने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जैसे टीवी का रिमोट, एसी का रिमोट और कंप्यूटर का वायरलेस माउस हमारे जीवन का अहम हिस्सा बन चुके हैं। इन उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले सेल या बैटरी कुछ समय बाद अपनी क्षमता खो देते हैं और काम करना बंद कर देते हैं। अमूमन लोग इन्हें खराब मानकर तुरंत कचरे में डाल देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि थोड़ी सी सावधानी और एक साधारण घरेलू नुस्खे की मदद से इन मृतप्राय सेलों को फिर से जीवित किया जा सकता है? इसके लिए आपको बाजार से कोई महंगी वस्तु लाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि मात्र पांच से दस रुपये की एक साधारण रबड़ या इरेज़र से यह काम आसानी से हो सकता है।

रबड़ के इस्तेमाल से कैसे लौटती है बैटरियों की जान

पैराग्राफ दो के अंतर्गत, यह प्रक्रिया बेहद सरल है और इसके लिए आपको किसी तकनीकी विशेषज्ञता की जरूरत नहीं है। जब भी आपके घर का कोई रिमोट या माउस अचानक काम करना बंद कर दे, तो सबसे पहले उसके अंदर लगे सेलों को बाहर निकाल लें। अक्सर इन बैटरियों के सिरों पर या फिर उनके मेटल कॉन्टैक्ट पॉइंट्स पर कार्बन की एक बारीक परत जम जाती है, जिसके कारण विद्युत प्रवाह रुक जाता है। अब आपको वही पांच से दस रुपये वाली साधारण स्टडी रबर लेनी है और उससे सेल के दोनों सिरों को अच्छी तरह से रगड़कर साफ करना है। इस प्रक्रिया से सेल पर जमी कार्बन की परत हट जाती है और वह फिर से विद्युत प्रवाह के लिए तैयार हो जाता है। जब आप रबड़ से अच्छी तरह घिसकर सेल और रिमोट के अंदर के स्प्रिंग्स को साफ कर देते हैं, तो उनका संपर्क फिर से मजबूत हो जाता है। इसके बाद जब आप उन सेलों को वापस उपकरण में लगाएंगे, तो आप देखेंगे कि वे पहले की तरह ही सुचारू रूप से काम करने लगे हैं। उत्तर प्रदेश और लखनऊ जैसे शहरों के आम परिवारों में भी इस तरह के छोटे-छोटे घरेलू नुस्खे बहुत लोकप्रिय हैं, जो न केवल पैसे बचाते हैं बल्कि कचरे को कम करने में भी मदद करते हैं। हालांकि, यह तरीका केवल तभी तक काम करता है जब सेल का रासायनिक जीवन पूरी तरह से समाप्त न हुआ हो और समस्या केवल कार्बन जमने की हो। इस प्रकार की छोटी-छोटी तकनीकें हमारे रोजमर्रा के जीवन को आसान बनाती हैं और अनावश्यक खर्चों पर लगाम लगाती हैं। बार-बार नए सेल खरीदने के बजाय इस आसान सी तरकीब को आजमाना पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद है, क्योंकि इससे इलेक्ट्रॉनिक कचरा कम उत्पन्न होता है। बाजार जाने या नए सेल पर पैसे खर्च करने से पहले इस आसान टिप को जरूर आजमाकर देखना चाहिए, ताकि समय और धन दोनों की बचत हो सके।
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