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राजनीतिक घमासान: सोनिया गांधी की नई किताब आरएसएस, चीन और पीएम मोदी के फैसलों पर घिरी
कांग्रेस नेता सोनिया गांधी द्वारा लिखित एक नई किताब के प्रकाशन के बाद देश की राजनीति में भूचाल आ गया है, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, चीन के साथ संबंधों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल पर तीखे सवाल उठाए गए हैं।
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Ankit Yadav
29 अग 2026, 12:08
भारतीय राजनीतिक गलियारों में उस समय हलचल तेज हो गई जब कांग्रेस पार्टी की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी की नवीनतम किताब सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में आ गई। इस प्रकाशन में देश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य, विदेश नीतियों और वैचारिक संगठनों पर कई गंभीर टिप्पणियां की गई हैं, जिसके बाद से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग छिड़ गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस किताब के बाजार में आने से आगामी राजनीतिक गतिविधियों पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है और चुनावों से पहले बहस का एक नया दौर शुरू हो गया है।
आरएसएस और चीन के मुद्दों पर गर्माई सियासत
किताब के अंदर जिन प्रमुख विषयों को प्रमुखता से उठाया गया है उनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस की कार्यशैली और वैचारिक प्रभाव के साथ-साथ पड़ोसी देश चीन के संदर्भ में अपनाई गई रणनीतियों की आलोचना शामिल है। लेखिका ने देश की आंतरिक सुरक्षा और कूटनीतिक मोर्चों पर वर्तमान प्रशासन की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। विशेष रूप से चीन के साथ लगती सीमाओं की सुरक्षा और कूटनीतिक वार्ताओं को लेकर जो बातें लिखी गई हैं, उन्होंने सामरिक विशेषज्ञों और राजनीतिक पंडितों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के कामकाज और नीतियों को भी इस ग्रंथ में तीखी समीक्षा का सामना करना पड़ा है। विभिन्न आर्थिक सुधारों, प्रशासनिक निर्णयों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिति को लेकर जो दावे किए गए हैं, उनका विपक्षी दलों द्वारा स्वागत किया जा रहा है, जबकि सत्तारूढ़ दल ने इसे पूरी तरह से निराधार और राजनीति से प्रेरित करार दिया है। लखनऊ समेत देश भर के राजनीतिक कार्यालयों में इस बात को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है कि कैसे यह किताब आने वाले दिनों में चुनावी भाषणों का मुख्य हिस्सा बन सकती है।
विपक्ष का समर्थन और सत्ता पक्ष का पलटवार
जैसे-जैसे इस विवादित पुस्तक के अंश सामने आ रहे हैं, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेता इसके समर्थन में खुलकर सामने आने लगे हैं। उनका कहना है कि यह रचना देश के सामने मौजूद कड़वी सच्चाइयों को उजागर करती है। इसके विपरीत, भारतीय जनता पार्टी और उससे जुड़े संगठनों के प्रवक्ताओं ने कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए कहा है कि यह केवल राजनीतिक एजेंडे के तहत लिखा गया साहित्य है, जिसका उद्देश्य जनता को भ्रमित करना और देश की छवि को धूमिल करना है।
आने वाले हफ्तों में इस किताब को लेकर देश भर में कई चर्चाओं, सेमिनारों और विरोध प्रदर्शनों के आयोजित होने की संभावना है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और अन्य प्रमुख महानगरों में भी इसके असर साफ दिखाई देने लगे हैं, जहां कार्यकर्ता इसके पक्ष और विपक्ष में बयानबाजी कर रहे हैं। जनता के बीच भी इस बात को लेकर उत्सुकता बढ़ गई है कि आखिर इस पठन सामग्री में ऐसे कौन से विशेष खुलासे किए गए हैं जो राजनीतिक तापमान को इस हद तक बढ़ाने में कामयाब रहे हैं।