एशियन गेम्स में हर्षिता का दूसरा पदक
जापान में चल रहे एशियन गेम्स-2026 में भारतीय सेलर हर्षिता तोमर ने एक बार फिर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। उन्होंने अपनी साथी खिलाड़ी शीतल वर्मा के साथ मिलकर 49er FX विमेंस स्किफ प्रतियोगिता में कांस्य पदक अपने नाम किया है। यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि एशियन गेम्स के मंच पर हर्षिता का यह दूसरा पदक है। इससे पहले उन्होंने वर्ष 2018 के जकार्ता एशियाई खेलों में 16 वर्ष की आयु में कांस्य पदक हासिल किया था। प्रतियोगिता के दौरान भारतीय जोड़ी ने शुरुआत में चौथा स्थान प्राप्त किया था। हालांकि, बाद में चीन की जोड़ी को अयोग्य घोषित किए जाने के बाद भारतीय टीम तीसरे स्थान पर पहुंच गई और उन्हें कांस्य पदक से सम्मानित किया गया। इस दौड़ में जापान ने स्वर्ण और हांगकांग की टीम ने रजत पदक हासिल किया। हर्षिता के इस शानदार प्रदर्शन ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली शीर्ष खिलाड़ियों में शामिल हैं।
बचपन की बीमारी और खेल का सफर
हर्षिता तोमर का खेलों से जुड़ाव किसी चमत्कार से कम नहीं है। महज ढाई वर्ष की उम्र में उन्हें पाचन संबंधी गंभीर समस्या थी, जिसके चलते उनके पिता देवेंद्र सिंह तोमर ने उन्हें पानी में रखने की चिकित्सकीय सलाह ली थी। इसके बाद उन्हें नर्मदापुरम के विवेकानंद घाट पर नर्मदा नदी के जल में ले जाने का सिलसिला शुरू हुआ। जल के साथ यही प्रारंभिक संपर्क उनकी खेल यात्रा की नींव बन गया। धीरे-धीरे हर्षिता ने तीन वर्ष की उम्र में सेठानी घाट पर तैराकी का प्रशिक्षण लेना शुरू किया। खेल के प्रति उनकी लगन को देखते हुए परिवार वर्ष 2011 में भोपाल स्थानांतरित हो गया ताकि उन्हें बेहतर सुविधाएं मिल सकें। वॉटर स्पोर्ट्स अकादमी में चयन होने के बाद उन्होंने सेलिंग का प्रशिक्षण लिया। सेलिंग एक ऐसी खेल विधा है जिसमें पाल वाली नाव को हवा की गति और दिशा के अनुसार नियंत्रित करना होता है। अकादमी में जाने से पहले हर्षिता ने इस खेल का नाम तक नहीं सुना था, लेकिन अपनी मेहनत से उन्होंने नाव और पाल संभालने की कला में महारत हासिल की।
परिवार का संघर्ष और भविष्य की राह
हर्षिता के पिता देवेंद्र सिंह तोमर एक किसान हैं और उन्होंने अपनी बेटियों के खेल करियर को संवारने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है। उन्होंने अपनी 11 एकड़ खेती को ठेके पर दे दिया है ताकि कमाई का अधिकांश हिस्सा बेटियों के प्रशिक्षण पर खर्च किया जा सके। हर्षिता की सफलता के बाद अब परिवार का ध्यान उनकी 13 वर्षीय छोटी बहन दीपिका तोमर पर केंद्रित है, जो जूनियर गोल्फ खिलाड़ी के रूप में पहचान बना रही हैं। दीपिका ने अब तक कई ट्रॉफियां जीती हैं और उनकी प्रैक्टिस के लिए पिता प्रतिदिन सुबह 3:30 बजे उठकर उन्हें आर्मी गोल्फ कोर्स ले जाते हैं। हर्षिता को 2018 के एशियाई खेलों के पदक के बाद भारतीय नौसेना में भी नौकरी मिली थी। उनके माता-पिता ने अपनी जीवनचर्या पूरी तरह से बेटियों के खेल शेड्यूल के अनुरूप ढाल ली है। परिवार के इस कठिन परिश्रम और निरंतर सहयोग ने हर्षिता को नर्मदा के घाट से उठाकर अंतरराष्ट्रीय पोडियम तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।