जन्मदिन और सिडनी टेस्ट का ऐतिहासिक संघर्ष
तेरह अक्टूबर उन्नीस सौ तिरानवे को जन्में खिलाड़ी ने आंध्र प्रदेश के काकीनाडा में जन्म लिया था और आज वह अपना तेतीसवां जन्मदिन मना रहे हैं। एक समय ऐसा था जब उन्हें भारतीय टेस्ट बल्लेबाजी की अगली दीवार माना जाता था, मगर आज उनका यह खास दिन गुमनामी के साए में बीत रहा है। साल इक्कीस का वह मुकाबला भला कौन भूला सकता है जब ऑस्ट्रेलियाई सरजमीं पर टीम हार के बिल्कुल करीब पहुंच चुकी थी। उस विकट परिस्थिति में इस जांबाज ने गंभीर रूप से अपनी मांसपेशियों के खिंचाव से जूझते हुए क्रीज पर कई घंटे बिताए थे। शरीर पर लगातार दर्द सहते हुए उन्होंने अपनी टीम को उस मुकाबले में हार से बचा लिया था और मुकाबले को बराबरी पर ला दिया था। देश के लिए अपना पूरा शरीर दांव पर लगाने वाले इस खिलाड़ी को बाद में बोर्ड और चयनकर्ताओं की तरफ से बेहद निराशाजनक रवैया देखने को मिला। बारह महीने बाद यानी जुलाई दो हजार बाईस के बाद से ही उन्हें राष्ट्रीय टीम की मुख्य ग्यारह से पूरी तरह बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इसके बाद से वह दोबारा कभी भी देश की नीली या सफेद जर्सी पहने हुए मैदान पर नजर नहीं आए और चयनकर्ताओं ने पूरी तरह से उनसे मुंह मोड़ लिया।
चयनकर्ताओं की अनदेखी और संघ का विवाद
राष्ट्रीय टीम से बाहर होने के बाद इस खिलाड़ी के दिल पर क्या गुजरी इसका खुलासा उन्होंने एक बातचीत के दौरान खुद किया था। उन्होंने अपने दर्द को बयां करते हुए बताया था कि जब वह टेस्ट दल का हिस्सा नहीं रहते थे तो उन्हें काफी तकलीफ होती थी। मुख्य कोच के साथ इंग्लैंड दौरे के बाद हुई आखिरी बातचीत के बाद से किसी ने भी उनका हालचाल तक नहीं पूछा था। उनके भीतर अब चयन को लेकर कोई उम्मीद नहीं बची थी और वह केवल अपना काम ईमानदारी से मैदान पर कर रहे थे। उनके इस प्रकार अचानक खेल से बाहर होने के पीछे केवल खराब प्रदर्शन ही वजह नहीं थी बल्कि इसके पीछे बोर्ड की अंदरूनी सियासत भी शामिल थी। साल चौबीस के दौरान रणजी ट्रॉफी मुकाबले के समय उनका विवाद राज्य के खेल संघ के साथ खुलकर सामने आ गया था। उस वाकये के बाद खिलाड़ी ने खुद यह राज खोला था कि स्थानीय राजनीति से जुड़े एक रसूखदार नेता के बेटे को डांटने की उन्हें यह सजा दी गई थी। संघ ने उन पर दबाव बनाते हुए कप्तानी छोड़ने का फरमान सुना दिया था और उनकी इस तानाशाही के विरोध में खिलाड़ी ने पंद्रह खिलाड़ियों के हस्ताक्षर वाला पत्र सार्वजनिक कर दिया था।
करियर के आंकड़े और भविष्य का अनिश्चित सफर
खेल संघ के खिलाफ आवाज उठाने के बाद इस खिलाड़ी का पूरा क्रिकेट करियर ही संकट में फंस गया और दांव पर लग गया। उस विवाद के बाद न तो कभी उनका चयन इंडिया-ए के लिए हुआ और न ही चयन समिति की बैठकों में कभी उनके नाम पर विचार किया गया। उन्होंने अपने अंतरराष्ट्रीय सफर के दौरान देश के लिए कुल सोलह टेस्ट मैचों की अट्ठाइस पारियों में हिस्सा लिया था। इन सभी पारियों में बल्लेबाजी करते हुए उन्होंने एक शतक और पांच अर्धशतकों की मदद से कुल आठ सौ उनतालीस रन बनाए थे। मैदान पर उनका रक्षात्मक खेल और कठिन समय में टिके रहने की क्षमता हमेशा से उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती थी। लेकिन आज वही खिलाड़ी सिस्टम की राजनीति और अफसरों की जिद के कारण गुमनामी के अंधेरे में कहीं बहुत दूर जा चुका है। कभी टीम की रीढ़ माने जाने वाले इस बल्लेबाज के करियर का इस तरह अंत होना भारतीय खेल प्रेमियों को हमेशा कचोटता रहेगा। उनके जन्मदिन के मौके पर आज भी उनके पुराने प्रशंसक उस सिडनी टेस्ट की ऐतिहासिक पारी को याद कर रहे हैं जब उन्होंने चोटिल होने के बावजूद हार टाल दी थी।