खेलों की महत्ता और नशा मुक्ति पर विशेष जोर देश के जाने-माने फिल्म निर्देशक और पटकथा लेखक प्रकाश झा ने हाल ही में युवा पीढ़ी के मार्गदर्शन के लिए एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए सीधा संवाद स्थापित किया है। उन्होंने अपने संबोधन में इस बात पर बहुत जोर दिया कि आज के समय में देश के नौनिहालों और किशोरों का शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ होना राष्ट्र निर्माण की सबसे पहली और अनिवार्य शर्त है। खेलकूद केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि यह अनुशासन, टीम वर्क और जीवन में आगे बढ़ने की अदम्य जिजीविषा सिखाते हैं। प्रकाश झा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि नशे की लत आज के दौर में युवा पीढ़ी को भीतर से खोखला कर रही है और यह सिर्फ एक व्यक्ति को नहीं बल्कि पूरे परिवार तथा समाज को तबाह कर देती है। इसलिए हर युवा का यह नैतिक कर्तव्य बनता है कि वह मादक पदार्थों से तौबा कर ले और अपने स्थानीय मैदानों तथा खेल परिसरों का रुख करे।
बदलते दौर में युवाओं के सामने खड़ी चुनौतियां और समाधान आज के इस आधुनिक और तकनीकी रूप से अत्यधिक विकसित युग में युवाओं की जीवनशैली में बहुत तेजी से नकारात्मक बदलाव आए हैं, जिसके कारण कई प्रकार की स्वास्थ्य समस्याएं और मानसिक तनाव आम बात हो गई है। मोबाइल स्क्रीन और सोशल मीडिया के मकड़जाल में उलझकर आज की युवा पीढ़ी शारीरिक गतिविधियों से दूर होती जा रही है, जो एक बहुत बड़ा चिंता का विषय है। ऐसे समय में जब समाज के भीतर नशे का कारोबार और इसकी गिरफ्त में आने वाले किशोरों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है, तब देश के प्रतिष्ठित और विचारशील व्यक्तित्वों का आगे आना बहुत आवश्यक हो जाता है। खेलकूद और सांस्कृतिक गतिविधियां किसी भी समाज के युवाओं को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने का सबसे बेहतरीन और अचूक माध्यम मानी जाती हैं। जब कोई प्रसिद्ध हस्ती या कलाकार सार्वजनिक मंच से इस तरह की गंभीर बुराइयों के खिलाफ मुखर होकर आवाज उठाता है, तो उसका सीधा और गहरा प्रभाव समाज की जमीनी हकीकत पर पड़ता है, जिससे जागरूकता की एक नई लहर पैदा होती है।
भविष्य की दिशा और समाज की साझी जिम्मेदारी किसी भी राष्ट्र का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी युवा शक्ति किस दिशा में आगे बढ़ रही है और उनके पास अपने सपनों को पूरा करने के लिए किस प्रकार के अवसर उपलब्ध हैं। प्रकाश झा द्वारा दिए गए इस संदेश के बाद अब यह स्थानीय समुदायों, शिक्षण संस्थानों और अभिभावकों की भी संयुक्त जिम्मेदारी बन जाती है कि वे बच्चों को खेल के मैदानों की तरफ आकर्षित करें। विद्यालयों और महाविद्यालयों में खेल प्रतियोगिताओं का नियमित आयोजन होना चाहिए ताकि प्रतिभाओं को निखरने का उचित मंच मिल सके। इसके साथ ही, नशा मुक्ति अभियानों को जन-आंदोलन का रूप देना होगा ताकि कोई भी किशोर भटक न सके। जब युवा खेल के मैदानों में पसीना बहाएंगे और अपनी ऊर्जा का सकारात्मक उपयोग करेंगे, तभी एक स्वस्थ, सशक्त और उन्नत समाज की परिकल्पना को वास्तविकता में बदला जा सकेगा। आने वाले दिनों में ऐसी पहलों से समाज में एक स्थायी और सकारात्मक बदलाव देखने की उम्मीद की जा रही है।