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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दौड़: अमिताभ कांत ने कहा कि भारत 22 प्रतिशत डेटा और 30 प्रतिशत टैलेंट के साथ रचेगा नया इतिहास
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की वैश्विक दौड़ में भारत की स्थिति को लेकर नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि देश इस महामुकाबले में बिल्कुल नहीं पिछड़ा है और आने वाले समय में अपनी प्रतिभा तथा डेटा क्षमता के दम पर एक नया मुकाम हासिल करेगा।
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Ankit Yadav
22 अग 2026, 13:20
वैश्विक तकनीकी परिदृश्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का दबदबा तेजी से बढ़ता जा रहा है, और दुनिया भर के देश इस दौड़ में बढ़त बनाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। इस बीच भारत की स्थिति और उसकी भविष्य की संभावनाओं को लेकर देश के जाने-माने नीति निर्माता अमिताभ कांत ने बेहद सकारात्मक और उत्साहजनक विचार रखे हैं। उनका मानना है कि भारत न केवल इस तकनीक को अपनाने में आगे है, बल्कि वैश्विक मंच पर एक मजबूत नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरने की पूरी क्षमता रखता है। उनके अनुसार देश के पास उपलब्ध संसाधन और बौद्धिक संपदा इसे दुनिया के किसी भी अग्रणी राष्ट्र के मुकाबले मजबूत स्थिति में खड़ा करते हैं।
डेटा और टैलेंट की ताकत
वर्तमान समय में तकनीक की दुनिया में डेटा को नया ईंधन माना जाता है, और भारत इस मामले में बेहद भाग्यशाली स्थिति में है। देश के पास विशाल मात्रा में डिजिटल डेटा उपलब्ध है जो भविष्य के एल्गोरिदम और मशीन लर्निंग मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण घटक है। अमिताभ कांत ने विशेष रूप से रेखांकित किया है कि भारत के पास कुल वैश्विक डेटा का बाईस प्रतिशत हिस्सा मौजूद है, जो किसी भी तकनीकी क्रांति का नेतृत्व करने के लिए एक अभूतपूर्व आधार प्रदान करता है। डेटा की इस विशाल उपलब्धता के अलावा देश की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा और अत्यधिक कुशल प्रतिभा है। उनके अनुसार दुनिया भर के कुल तकनीकी और एआई टैलेंट का तीस प्रतिशत हिस्सा भारत से आता है, जो सॉफ्टवेयर विकास से लेकर उन्नत डेटा विज्ञान तक हर क्षेत्र में अपनी卓越 क्षमता का लोहा मनवा रहा है।
भविष्य की संभावनाओं और आर्थिक प्रभाव की बात करें तो यह स्पष्ट है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आने वाले दशकों में हर उद्योग की रूपरेखा बदल देगा। कृषि से लेकर स्वास्थ्य सेवा तक और अंतरिक्ष अनुसंधान से लेकर वित्तीय बाजारों तक, एआई का अनुप्रयोग हर जगह अनिवार्य होता जा रहा है। ऐसे में देश के स्टार्टअप्स और बड़ी तकनीकी कंपनियों के लिए यह एक स्वर्णिम अवसर है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस अपार टैलेंट पूल और भारी-भरकम डेटा का सही दिशा में सदुपयोग किया जाए, तो भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं में से एक बन जाएगा। सरकार और निजी क्षेत्र दोनों ही मिलकर इस दिशा में कई नई पहलों पर काम कर रहे हैं, जिससे बुनियादी ढांचे को और अधिक सुदृढ़ किया जा सके।
चुनौतियां और आगे की राह
हालांकि इस क्षेत्र में असीम संभावनाएं हैं, फिर भी कुछ ऐसी चुनौतियां भी हैं जिन पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। कंप्यूटिंग पावर, अत्याधुनिक चिप निर्माण और उच्च स्तरीय अनुसंधान के लिए भारी निवेश की जरूरत होती है। इसके अलावा ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच डिजिटल विभाजन को पाटना तथा डेटा सुरक्षा से जुड़े कानूनों को सख्त बनाना भी बेहद जरूरी है। शिक्षा प्रणाली में लगातार बदलाव लाकर स्कूली स्तर से ही कोडिंग और एआई का आधारभूत ज्ञान देना भविष्य की पीढ़ी के लिए एक बड़ा कदम साबित होगा। उद्योग जगत के दिग्गजों का यह भी मानना है कि पारंपरिक उद्योगों को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के लिए बड़े पैमाने पर री-स्किलिंग अभियानों की आवश्यकता है ताकि कोई भी कार्यबल पीछे न छूटे।
निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि अमिताभ कांत द्वारा व्यक्त किया गया यह आत्मविश्वास देश के तकनीकी भविष्य की मजबूत नींव को दर्शाता है। यदि नीतियां समय पर लागू की गईं और सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा मिला, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत वैश्विक एआई मानचित्र पर शीर्ष राष्ट्रों की सूची में अपना नाम दर्ज कराएगा। दुनिया की निगाहें इस समय भारतीय नवप्रवर्तन पर टिकी हैं, और यह देखना दिलचस्प होगा कि देश के युवा वैज्ञानिक और उद्यमी आने वाले वर्षों में किस प्रकार इस चुनौती को अवसर में बदलते हैं।