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टेक्नोलॉजी

अनोखी बैटरी क्रांति: एमआईटी की नई सन इन ए बॉक्स तकनीक से अब ईंटें देंगी बिजली

विज्ञान की दुनिया में एक बड़ा और हैरान करने वाला नवा सामने आया है, जिसके तहत अब पारंपरिक ईंटों का इस्तेमाल ऊर्जा भंडारण और बिजली आपूर्ति के लिए किया जा सकेगा। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) के वैज्ञानिकों ने इस दिशा में एक बेहतरीन तकनीक विकसित की है।

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Ankit Yadav
24 अग 2026, 12:39
अनोखी बैटरी क्रांति: एमआईटी की नई सन इन ए बॉक्स तकनीक से अब ईंटें देंगी बिजली
वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं लगातार नवीकरणीय ऊर्जा के भंडारण के नए और किफायती तरीके तलाशने में जुटे रहते हैं। इसी कड़ी में एमआईटी के विशेषज्ञों ने एक ऐसी अनूठी तकनीक को जन्म दिया है जो भविष्य में ऊर्जा संकट से निपटने में बेहद मददगार साबित हो सकती है। इस प्रणाली के तहत साधारण ईंटों को एक खास किस्म की बैटरी में तब्दील किया जाता है, जो अत्यधिक तापमान को सहन करने की क्षमता रखती हैं। यह तकनीक विशेष रूप से सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा जैसी अनिरंतर ऊर्जा प्रणालियों के लिए वरदान साबित हो सकती है, जहां बिजली का उत्पादन मौसम और समय पर निर्भर करता है।

अत्यधिक तापमान पर काम करने का तरीका

वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई इस अभिनव प्रणाली को 'सन-इन-ए-बॉक्स' नाम दिया गया है। यह तकनीक लगभग 2,400 डिग्री फारेनहाइट या सेल्सियस के भारी-भरकम तापमान पर संचालित होती है। इस विधि में थर्मल एनर्जी यानी ऊष्मीय ऊर्जा को बेहद प्रभावी ढंग से संग्रहित किया जाता है और जरूरत पड़ने पर इसे वापस बिजली में परिवर्तित कर लिया जाता है। ईंटों की बनावट और उनकी सामग्री इस तरह की डिजाइन की जाती है कि वे इस भयंकर गर्मी को अपने अंदर सोखकर सुरक्षित रख सकें। जब भी ऊर्जा की मांग बढ़ती है, ये गर्म ईंटें जनरेटर की मदद से बिजली का उत्पादन शुरू कर देती हैं, जिससे ग्रिड को निरंतर बिजली मिलती रहती है। पारंपरिक बैटरियों की तुलना में यह तकनीक कई मायनों में काफी अलग और किफायती मानी जा रही है। आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली लिथियम-आयन बैटरियों को बनाने में महंगे और दुर्लभ खनिजों की आवश्यकता होती है, जो पर्यावरण के लिए भी नुकसानदेह हो सकते हैं। इसके विपरीत, एमआईटी की इस पद्धति में बुनियादी और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध सामग्रियों का उपयोग किया जाता है, जिससे लागत में भारी कमी आती है। इसके अलावा, इन थर्मल स्टोरेज ईंटों की उम्र पारंपरिक केमिकल बैटरियों से कहीं अधिक लंबी होती है और इनमें खतरनाक रसायनों के रिसाव का खतरा भी नहीं रहता है। भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिहाज से इस आविष्कार को एक मील का पत्थर माना जा रहा है। दुनिया भर के ऊर्जा विशेषज्ञ इस बात पर जोर दे रहे हैं कि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने के लिए इस तरह के बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण समाधानों की सख्त जरूरत है। हालांकि यह तकनीक अभी अपने शुरुआती विकास और प्रायोगिक चरणों में है, लेकिन आने वाले समय में औद्योगिक और आवासीय दोनों क्षेत्रों में इसका व्यापक उपयोग देखने को मिल सकता है। शोधकर्ताओं की टीम इस तकनीक को और अधिक कुशल बनाने और इसकी लागत को और अधिक घटाने के लिए लगातार परीक्षण कर रही है ताकि इसे वैश्विक स्तर पर आसानी से अपनाया जा सके।
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