वैश्विक तकनीकी मानचित्र पर भारत को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में आज इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने संसद के मानसून सत्र के दौरान एक ऐतिहासिक सेमीकंडक्टर नीति पेश की। इस नई नीति के तहत देश में चिप डिजाइन से लेकर फैब्रिकेशन यूनिट्स की स्थापना तक के लिए कुल 76,000 करोड़ रुपये के अतिरिक्त निवेश का प्रावधान किया गया है। सरकार का यह कदम विदेशी कंपनियों पर निर्भरता को कम करने और घरेलू तकनीकी उद्योग को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सबसे बड़ा प्रयास माना जा रहा है।
स्टार्टअप्स और अनुसंधान के लिए विशेष अनुदान इस नई नीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें देश के इंजीनियरिंग संस्थानों और तकनीकी स्टार्टअप्स के लिए विशेष अनुसंधान अनुदान की व्यवस्था की गई है। आईआईटी और अन्य प्रमुख संस्थानों में एडवांस्ड चिप डिजाइन लेबोरेटरी स्थापित की जाएंगी, जिससे युवाओं को रोजगार के नए और बेहतर अवसर मिल सकें। केंद्रीय मंत्री ने सदन को संबोधित करते हुए कहा कि आने वाले तीन वर्षों में भारत में कम से कम पांच बड़े सेमीकंडक्टर प्लांट पूरी तरह से काम करना शुरू कर देंगे, जिससे ऑटोमोबाइल और स्मार्टफोन निर्माण उद्योगों को सबसे बड़ा फायदा होगा।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग और आपूर्ति श्रृंखला इस पहल के तहत अमेरिका, जापान और ताइवान की प्रमुख तकनीकी कंपनियों के साथ रणनीतिक समझौते किए गए हैं ताकि अत्याधुनिक तकनीक का आदान-प्रदान सुगम हो सके। संसद में हुई चर्चा के दौरान उद्योग जगत के विशेषज्ञों ने इस नीति का स्वागत किया है और उम्मीद जताई है कि इससे देश में 'मेक इन इंडिया' अभियान को अभूतपूर्व गति मिलेगी। सरकार का लक्ष्य 2028 तक वैश्विक सेमीकंडक्टर बाजार में भारत की हिस्सेदारी को कम से कम 10 प्रतिशत तक पहुँचाना है, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है।