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अमर क्रांतिकारी की गाथा: साल 1907 में जर्मनी में तिरंगे का पहला रूप फहराने वाली और पैंतीस साल वनवास काटने वाली साहसी पारसी महिला मैडम कामा

मैडम भीकाजी कामा वह साहसी पारसी क्रांतिकारी थीं जिन्होंने वर्ष 1907 में जर्मनी के श्टुटगार्ट में भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान तिरंगे का प्रारंभिक स्वरूप पहली बार दुनिया के सामने फहराया था।

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Kantap News डेस्क
16 अग 2026, 12:04
अमर क्रांतिकारी की गाथा: साल 1907 में जर्मनी में तिरंगे का पहला रूप फहराने वाली और पैंतीस साल वनवास काटने वाली साहसी पारसी महिला मैडम कामा
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ ऐसे असाधारण व्यक्तित्व हैं जिनके त्याग और समर्पण ने देश की आजादी की नींव को मजबूत किया, और इनमें मैडम भीकाजी कामा का नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है। एक अत्यंत समृद्ध पारसी परिवार में जन्मी भीकाजी कामा ने अपने ऐश्वर्यशाली जीवन को त्यागकर भारत की आजादी को अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। वर्ष 1907 में जर्मनी के श्टुटगार्ट शहर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन के दौरान उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत को खुली चुनौती देते हुए भारतीय स्वतंत्रता का प्रतीक झंडा फहराया था। उनके द्वारा डिजाइन किया गया वह शुरुआती तिरंगा इस बात का गवाह था कि भारत के सपूत देश से बाहर रहकर भी आजादी की अलख जगाए हुए थे। अपने इस साहसी कदम के बाद उन्हें लंबे समय तक देश वापस लौटने का अवसर नहीं मिला और उन्होंने लगभग पैंतीस साल का एक लंबा अरसा निर्वासन में बिताया।

जेवर बेचकर की क्रांतिकारियों की मदद

मैडम कामा ने न केवल विदेशी धरती पर भारत की आवाज बुलंद की, बल्कि भूमिगत और सक्रिय क्रांतिकारियों को वित्तीय सहायता प्रदान करने में भी अहम भूमिका निभाई। अपने पास मौजूद सभी बहुमूल्य आभूषणों और संपत्ति को बेचकर उन्होंने उस धन को भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों और विदेशों में पढ़ रहे भारतीय छात्रों की मदद के लिए इस्तेमाल किया। ब्रिटिश सरकार के कड़े विरोध और गिरफ्तारी के वारंट के बावजूद उन्होंने कभी अपना हौसला नहीं टूटने दिया और लंदन तथा पेरिस से गुप्त रूप से क्रांतिकारी साहित्य का प्रकाशन एवं वितरण जारी रखा। उनके द्वारा प्रकाशित पत्रिकाओं और पैम्फलेट्स ने उपनिवेशवाद के खिलाफ वैश्विक जनमत तैयार करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी।

बलिदान को याद करने का दिन

आज जब देश अपनी स्वतंत्रता के महान पर्व मना रहा है, तब मैडम भीकाजी कामा जैसी अमर वीरांगनाओं के योगदान को स्मरण करना हर भारतीय का कर्तव्य बनता है। उनका पूरा जीवन इस बात का प्रमाण है कि अटूट देशभक्ति और दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे बड़ी से बड़ी साम्राज्यवादी शक्तियां भी पस्त हो जाती हैं। उनके द्वारा जलाए गए स्वतंत्रता के दीप की रोशनी आज भी देश की युवा पीढ़ी को प्रेरित करती है और हमें यह याद दिलाती है कि आज़ादी हमें कितनी बड़ी कुर्बानियों के बाद मिली है।
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