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इतिहास के पन्ने: जब आजादी की पूर्व संध्या पर जोधपुर रियासत के विलय को लेकर हुआ था कड़ा संघर्ष

ब्रिटिश साम्राज्य के जाने के ठीक पहले जोधपुर के युवा राजा के समक्ष आए राजनीतिक विकल्पों और उस दौर के दिलचस्प ऐतिहासिक किस्सों पर एक नजर।

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Kantap News डेस्क
13 अग 2026, 16:06
इतिहास के पन्ने: जब आजादी की पूर्व संध्या पर जोधपुर रियासत के विलय को लेकर हुआ था कड़ा संघर्ष
भारतीय इतिहास के वे पन्ने जब देश के नक्शे को अंतिम रूप दिया जा रहा था, अनगिनत अनसुनी कहानियों और राजनीतिक उठापटक से भरे पड़े हैं। ऐसे ही एक रोमांचक प्रसंग में मारवाड़ के नाम से मशहूर जोधपुर रियासत का भारत संघ में विलय का मामला शामिल है। जब ब्रिटिश हुकूमत भारत छोड़ने की तैयारी कर रही थी, तब महज चौबीस वर्ष की आयु वाले एक युवा राजा ने देश की सबसे बड़ी रियासतों में से एक की कमान संभाली थी। उस समय रियासतों के सामने यह बड़ी असमंजस की स्थिति थी कि वे स्वतंत्र रहें या भारत अथवा पाकिस्तान में से किसी एक का हिस्सा बनें।

मारवाड़ का रणनीतिक महत्व और पैंतरेबाजी

जोधपुर रियासत का भौगोलिक क्षेत्रफल और उसकी सीमाएं पाकिस्तान से सटने के कारण रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण थीं। मोहम्मद अली जिन्ना और उनके सहयोगियों की पैनी नजर इस बात पर थी कि किसी तरह इस विशाल रियासत को अपनी तरफ मिलाया जाए, ताकि पश्चिमी सीमा पर उनकी पकड़ मजबूत हो सके। इसके लिए तत्कालीन युवा शासक महाराजा हवंत सिंह के साथ कई दौर की गुप्त और नाटकीय बैठकें भी हुईं, जिनमें उन्हें कई तरह के लुभावने प्रस्ताव दिए गए थे। हालांकि, सरदार वल्लभभाई पटेल और वी.पी. मेनन की दूरदर्शी कूटनीति के चलते इस रियासत को अंततः भारत में मिलाने में सफलता हासिल हुई।

ऐतिहासिक सबक और वर्तमान विरासत

यह घटना इस बात का प्रमाण है कि यदि उस समय थोड़ी सी भी प्रशासनिक चूक हो जाती, तो देश के नक्शे की तस्वीर कुछ और ही होती। जोधपुर के विलय का वह नाटकिया सौदा और उसके पीछे चली राजनीतिक चालें आज भी आधुनिक भारतीय इतिहास के सबसे दिलचस्प अध्यायों में गिने जाते हैं। इन ऐतिहासिक दस्तावेजों और किस्सों के जरिए नई पीढ़ी को यह समझने का अवसर मिलता है कि स्वतंत्रता सेनानियों और रियासती विभाग के नेताओं ने किस प्रकार विषम परिस्थितियों में देश की अखंडता को सुरक्षित रखने के लिए कड़े संघर्ष किए थे।
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