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विभाजन का दर्द: धार्मिक पहचान के आधार पर राजनीतिक अपनेपन को तय करने के गंभीर खतरे

देश के विभाजन के इतिहास और उससे जुड़े सामाजिक-राजनीतिक प्रभावों पर चर्चा करते हुए विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि धार्मिक पहचान को राजनीति का आधार बनाना खतरनाक है।

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Kantap News डेस्क
16 अग 2026, 17:58
विभाजन का दर्द: धार्मिक पहचान के आधार पर राजनीतिक अपनेपन को तय करने के गंभीर खतरे
भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन का इतिहास आज भी हमारे समाज और राजनीति को गहरे तौर पर प्रभावित करता है। हाल ही में इस विषय पर हुए वैचारिक मंथन में इतिहासकारों और विचारकों ने इस बात पर जोर दिया है कि किस प्रकार धार्मिक पहचान के आधार पर राजनीतिक अपनेपन या नागरिकता को परिभाषित करने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक ताने-बाने को कमजोर करती है। विभाजन के समय जो विभीषिका देश ने झेली थी, उसका मुख्य कारण यही था कि लोगों को उनके मजहब के चश्मे से देखा जाने लगा था। आज के आधुनिक दौर में भी यदि उसी संकीर्ण मानसिकता को दोहराया जाता है, तो यह देश की बहुलतावादी संस्कृति के लिए एक गंभीर चुनौती बन सकता है।

बहुलवाद और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा

भारतीय संविधान ने देश के हर नागरिक को उसकी जाति, धर्म या भाषा से ऊपर उठकर समान अधिकार और पहचान प्रदान की है। जब कभी भी राजनीतिक लाभ के लिए धार्मिक पहचान को प्राथमिकता दी जाती है, तब संविधान की मूल भावना को ठेस पहुंचती है। बुद्धिजीवियों का कहना है कि इतिहास की इन कड़वी सच्चाइयों से सबक लेकर समाज को जोड़ने वाली ताकतों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, न कि बांटने वाली विचारधाराओं को। लोकतंत्र की असली खूबसूरती उसकी विविधता में निहित है, और इस विविधता का सम्मान करना हर नागरिक तथा राजनीतिक दल का दायित्व है।

आगामी पीढ़ियों के लिए सबक

आने वाली पीढ़ियों को इतिहास के सही और निष्पक्ष पाठ पढ़ाना बेहद जरूरी है ताकि वे विभाजन जैसी त्रासदियों के असल कारणों को समझ सकें। केवल आपसी सद्भाव और सेक्युलर मूल्यों के बूते ही देश को विकास के मार्ग पर आगे ले जाया जा सकता है। वैचारिक मंचों से उठ रही इन आवाजों का मुख्य उद्देश्य समाज में शांति, भाईचारा और समावेशी राजनीति की नींव को और अधिक मजबूत करना है।
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