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हरतालिका तीज व्रत: जानिए इस कठिन उपवास का धार्मिक महत्व और ज्योतिषीय दृष्टिकोण
सनातन संस्कृति में हरतालिका तीज के पावन व्रत का अत्यंत विशिष्ट स्थान है, जिसे सुहागिन महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ अत्यंत निष्ठा और कठोर नियमों के तहत पूर्ण करती हैं।
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Ankit Yadav
12 सित 2026, 10:37
सनातन परंपरा के अंतर्गत हरतालिका तीज का व्रत बेहद कठिन और महत्वपूर्ण उपवासों में से एक माना जाता है, जिसे मुख्य रूप से सुहागिनें और सुयोग्य वर की प्राप्ति की इच्छा रखने वाली कन्याएं रखती हैं। इस पावन अवसर पर माता पार्वती और भगवान शिव की विधि-विधान से आराधना की जाती है ताकि वैवाहिक जीवन में सदैव प्रेम, शांति और स्थिरता बनी रहे। लखनऊ समेत उत्तर प्रदेश के तमाम जिलों में इस व्रत को लेकर महिलाओं में भारी उत्साह देखने को मिलता है, जहाँ बाजारों में पूजन सामग्री और श्रृंगार की दुकानों पर खासी चहल-पहल नजर आती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस उपवास की कठोरता इस बात में निहित है कि इसमें अन्न और जल दोनों का त्याग किया जाता है, जिसे निर्जल व्रत के रूप में पूर्ण किया जाता है।
धार्मिक और पौराणिक महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस व्रत को सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए घने जंगलों में रहकर कठिन तपस्या के साथ किया था। इसी वजह से इस उपवास का नाम हरतालिका पड़ा, जो हाथों से हरण किए जाने और सखियों द्वारा माता को सुरक्षित स्थान पर ले जाने की कथा से जुड़ा हुआ है। धार्मिक जानकारों का ऐसा मानना है कि जो सुहागिन महिलाएं इस कठिन व्रत को पूर्ण श्रद्धा के साथ करती हैं, उन्हें माँ पार्वती की तरह ही अखंड सौभाग्य और अटूट दांपत्य सुख की प्राप्ति होती है। व्रत के दौरान रात्रि जागरण करने का भी विशेष विधान है, जिसमें भजन-कीर्तन करते हुए पूरी रात भगवान शिव और माता के नाम का स्मरण किया जाता है, जिससे घर-परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और समस्त प्रकार के कष्टों का नाश होता है।
कुंडली और ग्रहों का प्रभाव
ज्योतिष शास्त्र और कुंडली के दृष्टिकोण से भी इस व्रत का गहरा संबंध ग्रहों की स्थिति और उनके प्रभावों से जोड़ा जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस दिन किए जाने वाले विशेष पूजन और अनुष्ठानों से जन्मपत्री में मौजूद चंद्र, शुक्र और मंगल से जुड़े दोषों को शांत करने में मदद मिलती है, जो सीधे तौर पर वैवाहिक जीवन और प्रेम संबंधों को प्रभावित करते हैं। लखनऊ के कई प्रमुख ज्योतिष आचार्यों का कहना है कि जब कोई जातक या जातिका सच्चे मन से इस दिन उपवास रखता है, तो उसकी कुंडली में वैवाहिक सुख के योग मजबूत होते हैं और आपसी कलह या बाधाएं दूर होती हैं। ग्रहों की अनुकूलता प्राप्त करने के लिए यह व्रत अत्यंत चमत्कारी परिणाम देने वाला माना जाता है, बशर्ते इसे पूरे नियमों और विधि-विधान के साथ संपन्न किया जाए।
व्रत के दौरान बरती जाने वाली सावधानियां
चूंकि यह एक बेहद कठिन उपवास है, इसलिए स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक माना जाता है जितना कि धार्मिक नियमों का पालन करना। व्रत रखने वाली महिलाओं को चाहिए कि वे उपवास से एक दिन पहले सात्विक भोजन ग्रहण करें और अपनी शारीरिक क्षमता को ध्यान में रखते हुए ही निर्जल व्रत के नियमों का पालन करें। बुजुर्गों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रही महिलाओं को चिकित्सा सलाह के बाद ही ऐसे कठिन उपवास करने की सलाह दी जाती है। इस व्रत के समापन के पश्चात अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है, जिसमें सात्विक आहार और अन्न-जल ग्रहण करके व्रत खोला जाता है। पूरे देश के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में इस पर्व को लेकर महिलाओं में जो उमंग और अनुशासन दिखाई देता है, वह हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और अटूट आस्था का जीवंत उदाहरण है।