जयपुर में पुतलों की विशाल रेंज
जयपुर शहर में दशहरे के पावन उत्सव की तैयारियां अब अपने अंतिम चरणों में पहुंच चुकी हैं। स्थानीय रावण मंडी में कारीगरों ने छोटे और बड़े आकार के पुतले सजाए हैं। इन पुतलों की लंबाई एक फुट से शुरू होकर 40 फुट की ऊंचाई तक पहुंच जाती है। अभी तक कारीगरों ने लगभग 1500 से 2000 के बीच पुतले पूरी तरह तैयार कर लिए हैं। कई ग्राहकों ने अपने ऑर्डर पहले ही बुक करा दिए थे, जिन्हें समय रहते पहुंचाया भी जा चुका है। अन्य बचे हुए ऑर्डर पूरे करने के लिए कारीगर पूरी तन्मयता से काम में जुटे हुए हैं। शहर के प्रमुख मैदानों के अलावा अब कॉलोनियों और सोसायटियों में भी रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन किया जाता है। इस बढ़ती मांग के कारण बाजार में काफी रौनक देखी जा सकती है। रंग-बिरंगे कागज और चमकदार सामग्री का उपयोग करके इन पुतलों को विशेष रूप से आकर्षक बनाया गया है ताकि लोग इन्हें खरीदकर अपने क्षेत्रों में ले जा सकें।
कारीगरों की मेहनत और बढ़ती मुश्किलें
रावण के पुतले बनाने का काम एक कुशल कला है जिसमें कारीगरों को ढाई से तीन महीने का लंबा समय लगता है। यह पुतले कई गरीब परिवारों की कमाई का अहम साधन हैं। वर्तमान में मौसम के बदलते मिजाज और हालिया बारिश ने कारीगरों के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। पुतलों को भीगने से बचाने के लिए कारीगर उन्हें ढंककर रखने पर मजबूर हैं, फिर भी कुछ पुतले बारिश की चपेट में आकर प्रभावित हुए हैं। इन सबके बावजूद कारीगर पूरी लगन से काम पूरा करने में लगे हैं ताकि दशहरे से पूर्व डिलीवरी हो सके। पुतलों की कीमत उनके आकार और बनावट पर निर्भर करती है। छोटे आकार के एक फुट ऊंचे रावण की कीमत 300 रुपये से प्रारंभ होती है, जबकि बड़े और भव्य पुतलों का दाम 30,000 से 35,000 रुपये तक हो सकता है। ग्राहकों को पुतले सौंप दिए जाते हैं और उसमें आतिशबाजी भरने का काम आयोजक स्वयं अपनी सुविधा अनुसार करते हैं।
बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक
दशहरे के दिन रामलीला के समापन पर बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक स्वरूप रावण दहन की परंपरा निभाई जाती है। जयपुर की रावण मंडी के अतिरिक्त शहर के विभिन्न हिस्सों में भी कारीगरों द्वारा रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के विशाल पुतले बनाए जा रहे हैं। इस समय पूरे शहर में त्योहार का उत्साह देखा जा सकता है और लोग अपनी कॉलोनियों में दहन के कार्यक्रम की योजना बना रहे हैं। कारीगरों की कड़ी मेहनत यह सुनिश्चित करती है कि दशहरे पर बुराई के प्रतीक पुतलों को जलाकर लोग परंपरा को पूरी शिद्दत से मना सकें। मौसम की बाधाओं के बावजूद इस सीजन में कारीगरों को बड़ी संख्या में ऑर्डर मिले हैं जिससे उनके काम की मांग स्पष्ट होती है। पुतलों का निर्माण करना केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक धरोहर को आगे बढ़ाने का जरिया है। आने वाले दिनों में यह पुतले शहर के विभिन्न मैदानों और आवासीय परिसरों में दहन के लिए सजाए जाएंगे और लोग हर्षोल्लास के साथ पर्व मनाएंगे।