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पीढ़ीगत अंतराल: राजनीतिक विचारधाराओं के कारण माता-पिता और बच्चों में बढ़ती दूरियां

भारत के शहरी परिवारों में राजनीतिक विचारधाराओं के मतभेद अब घर-परिवार के रिश्तों में दरार की वजह बनने लगे हैं।

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Kantap News डेस्क
13 अग 2026, 17:04
पीढ़ीगत अंतराल: राजनीतिक विचारधाराओं के कारण माता-पिता और बच्चों में बढ़ती दूरियां
आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया और खबरों की अति-उपलब्धता ने हर व्यक्ति की राजनीतिक राय को बहुत मजबूत कर दिया है। स्थिति यह आ गई है कि माता-पिता और उनकी संतान के बीच राजनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर गंभीर वैचारिक टकराव देखने को मिल रहा है। पारंपरिक पारिवारिक संवाद की जगह अब तीखी राजनीतिक बहसें ले रही हैं, जिससे कई घरों में भावनात्मक दूरियां बढ़ती जा रही हैं। समाजशास्त्रियों का मानना है कि यह आधुनिक भारतीय परिवार के लिए एक नया और चिंताजनक ट्रेंड है, जो पहले कभी इस रूप में नहीं देखा गया था।

डिनर टेबल की तीखी बहसें

अक्सर यह देखा गया है कि शाम की चाय या रात के खाने के समय होने वाली चर्चाएं कुछ ही मिनटों में उग्र राजनीतिक बहसों में बदल जाती हैं। पुरानी पीढ़ी जहां अपने अनुभवों और पारंपरिक मूल्यों के आधार पर सोचती है, वहीं नई पीढ़ी आधुनिक आख्यानों और सोशल मीडिया के प्रभावों से लैस होकर अपनी बात रखती है। इस वैचारिक असमानता के कारण कई घरों में संवादहीनता की स्थिति पैदा हो रही है। बच्चे अपने माता-पिता के राजनीतिक दृष्टिकोण को रूढ़िवादी मानने लगते हैं, जबकि माता-पिता अपनी संतानों को अतिવાदी या भटके हुए समझने की भूल कर बैठते हैं।

रिश्तों को बचाने की चुनौती

इस बढ़ते अंतराल को पाटने के लिए यह आवश्यक है कि परिवार के सदस्य राजनीति को अपने व्यक्तिगत रिश्तों से ऊपर न रखें। आपसी सम्मान और सहिष्णुता का परिचय देते हुए यह स्वीकार करना होगा कि हर व्यक्ति की अपनी स्वतंत्र सोच हो सकती है। मनोवैज्ञानिकों की सलाह है कि परिवारों में ऐसे विषयों पर बात करते समय संयम बरतना चाहिए ताकि घर का सुकून और प्यार बना रहे। आखिरकार, वैचारिक मतभेद परिवार की आत्मीयता से बड़े नहीं हो सकते।
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