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सांस्कृतिक विरासत: बदलते समय में भी जीवित है कूच बिहार की शीतल पाटी कला

बदलते दौर और आधुनिकता के इस युग में भी कूच बिहार की पारंपरिक शीतल पाटी कला अपनी प्राचीन पहचान को सहेजे हुए है, जिसे बुनकर मुरता के पौधों की मदद से जीवित रखे हुए हैं।

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Ankit Yadav
24 अग 2026, 18:02
सांस्कृतिक विरासत: बदलते समय में भी जीवित है कूच बिहार की शीतल पाटी कला
पारंपरिक कलाओं और शिल्पकारों के हुनर को बचाने की दिशा में कूच बिहार की शीतल पाटी कला एक अनूठा उदाहरण पेश करती है। आज के समय में जब हर चीज़ मशीनीकृत होती जा रही है, तब भी यह हस्तशिल्प अपनी जड़ों से मजबूती के साथ जुड़ा हुआ है। मुरता नामक पौधे के विशेष तनों का उपयोग करके स्थानीय बुनकर इस अद्भुत कला को पीढ़ियों से आगे बढ़ा रहे हैं। इस कला की सबसे बड़ी विशेषता इसकी बारीकी और पारंपरिक तकनीक है, जिसे सीखने और तैयार करने में काफी मेहनत और धैर्य की आवश्यकता होती है। आधुनिकता के प्रभाव के बीच भी कारीगरों की लगन यह साबित करती है कि पारंपरिक विरासत आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी पहले हुआ करती थी।

मुरता के पौधे और बुनकरों का अनूठा कौशल

शीतल पाटी मुख्य रूप से चटाई या बैठने के लिए इस्तेमाल होने वाली दरी जैसी होती है, जो अपनी ठंडक और विशेष बनावट के लिए जानी जाती है। इसे तैयार करने की प्रक्रिया काफी जटिल होती है। सबसे पहले जंगलों या खेतों से मुरता के पौधों को काटा जाता है और फिर उनके छिलकों को निकालकर बेहद करीने से तराशा जाता है। इसके बाद स्थानीय बुनकर अपने हाथों की जादुई कलाकारी से इन पट्टियों को आपस में पिरोकर एक खूबसूरत और टिकाऊ वस्तु का रूप देते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में मशीनों का न्यूनतम या बिल्कुल उपयोग नहीं होता, जिससे हर एक पाटी अपने आप में अनूठी और हस्तनिर्मित उत्कृष्ट कलाकृति बन जाती है। बुनकरों का यह समुदाय पीढ़ियों से इस पारंपरिक पेशे से जुड़ा रहा है। हालांकि आधुनिक समय में बाजार की बदलती मांग और सस्ते सिंथेटिक विकल्पों ने इनके सामने कई तरह की आर्थिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं, फिर भी कारीगरों का उत्साह कम नहीं हुआ है। वे अपनी कला को बचाने के लिए नए तरीकों और डिजाइनों को अपना रहे हैं ताकि युवा पीढ़ी भी इससे जुड़ सके। सरकारी सहायता और कला प्रेमियों के सहयोग से इस प्राचीन शिल्प को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान मिल रही है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रकार की पारंपरिक कलाओं को संरक्षित करने के लिए निरंतर प्रयास किए जाते रहें, तो न केवल देश की सांस्कृतिक धरोहर सुरक्षित रहेगी बल्कि स्थानीय बुनकरों को भी उचित आजीविका मिलती रहेगी। आने वाले समय में इस कला के संरक्षण के लिए और अधिक प्रशिक्षण शिविरों और विपणन मंचों की आवश्यकता महसूस की जा रही है ताकि कूच बिहार की यह पहचान देश-दुनिया तक आसानी से पहुंच सके।
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