झारखंड के पठारी क्षेत्रों की जलवायु मोटे अनाजों जैसे रागी, मडुआ, ज्वार और बाजरा की खेती के लिए अत्यंत अनुकूल मानी जाती है। इसी क्षमता को पहचानते हुए आज हजारीबाग के कृषि विज्ञान केंद्र में कृषि वैज्ञानिकों और जिला प्रशासन के अधिकारियों की मौजूदगी में एक महत्वपूर्ण कार्यशाला संपन्न हुई। कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि मोटे अनाज न केवल सूखे के प्रति सहनशील होते हैं, बल्कि इनमें पोषक तत्वों की मात्रा भी अत्यधिक होती है जिससे स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं के बीच इनकी मांग लगातार बढ़ रही है। किसानों को रागी और कुट्टू की उन्नत किस्मों के बीज वितरित किए गए और उन्हें कम लागत में अधिक पैदावार लेने के वैज्ञानिक तरीकों का व्यावहारिक प्रदर्शन भी दिखाया गया।
मूल्य संवर्धन (Value Addition) और पैकेजिंग
कार्यशाला का मुख्य आकर्षण मोटे अनाजों के प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर केंद्रित विशेष सत्र था। वैज्ञानिकों ने किसानों को समझाया कि केवल कच्चा अनाज बेचने के बजाय यदि वे उसका आटा, बिस्कुट, कुकीज़ और रेडी-टू-ईट स्नैक्स बनाकर बेचें तो उनकी आमदनी में कई गुना वृद्धि हो सकती है। इसके लिए कृषि विज्ञान केंद्र परिसर में ही स्थापित मिनी प्रोसेसिंग यूनिट के संचालन का प्रशिक्षण भी किसानों को दिया गया। पैकेजिंग और ब्रांडिंग के आधुनिक तरीकों के बारे में बताते हुए विशेषज्ञों ने कहा कि सही पैकेजिंग से उत्पादों की शेल्फ लाइफ बढ़ जाती है और उन्हें बड़े शहरी बाजारों या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर आसानी से बेचा जा सकता है।
वित्तीय सहायता और किसान उत्पादक संगठन (FPO) की भूमिका
कार्यक्रम के अंतिम सत्र में नाबार्ड और विभिन्न बैंकों के अधिकारियों ने किसानों को कृषि ऋण योजनाओं, मुद्रा लोन और किसान उत्पादक संगठनों (FPO) के गठन के फायदों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। अधिकारियों ने बताया कि यदि छोटे किसान मिलकर अपना FPO बना लेते हैं तो वे थोक में खाद-बीज खरीदने और अपने उत्पादों को सीधे बड़े खरीदारों तक पहुँचाने में सक्षम हो जाएंगे जिससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो जाएगी। कार्यशाला में भाग लेने वाले किसानों ने अपने अनुभव साझा किए और सरकार द्वारा चलाई जा रही इन योजनाओं पर संतोष व्यक्त किया। इस पहल से हजारीबाग के ग्रामीण इलाकों में किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होने की प्रबल संभावना बन गई है।