रांची के मुख्य सांस्कृतिक केंद्र में आज झारखंड की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और लोक कलाओं को सहेजने के लिए एक दिवसीय विशेष कार्यशाला का उद्घाटन किया गया। इस आयोजन में राज्य के विभिन्न जिलों से आए पारंपरिक चित्रकारों, मूर्तिकारों और शिल्पकारों ने हिस्सा लिया है। सोहराय और कोहवर पेंटिंग जैसी प्राचीन विधाओं के साथ-साथ बांस और लकड़ी से बनने वाले पारंपरिक हस्तशिल्प के प्रदर्शन ने उपस्थित सभी लोगों का मन मोह लिया। आयोजकों का कहना है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में विलुप्त हो रही इन कलाओं को पुनर्जीवित करना और नई पीढ़ी को इनसे जोड़ना इस कार्यशाला का मुख्य लक्ष्य है।
कलाकारों के लिए रोजगार के नए अवसर इस कार्यशाला के माध्यम से युवा पीढ़ी को पारंपरिक तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है ताकि वे अपनी पैतृक कला को आजीविका का साधन बना सकें। राज्य सरकार के हस्तशिल्प विकास निगम के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में कलाकारों को उनके उत्पादों के उचित मूल्य दिलाने और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए उन्हें बाजार उपलब्ध कराने के तरीकों पर भी विस्तार से चर्चा की गई। वरिष्ठ कलाकारों ने युवाओं को अपने अनुभवों से अवगत कराया और उन्हें कला के क्षेत्र में आने वाली चुनौतियों का सामना करने के गुर सिखाए।
रांची शहर में आयोजित इस अनूठी सांस्कृतिक पहल की चारों तरफ सराहना हो रही है। इस प्रकार के आयोजनों से न केवल झारखंड की लोक संस्कृति को बढ़ावा मिल रहा है, बल्कि देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के बीच भी यहां की कला के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है। कार्यशाला के अंत में उत्कृष्ट कृतियों का प्रदर्शन करने वाले कलाकारों को सम्मानित किया जाएगा, जिससे उनके मनोबल में और अधिक वृद्धि होगी।