उत्तर प्रदेश में सरकारी और सार्वजनिक जमीनों पर बढ़ते अतिक्रमण को रोकने के लिए सरकार अब शहरी क्षेत्रों में भूमि ऑडिट कराने की तैयारी कर रही है। इस प्रक्रिया के तहत राज्य के 17 प्रमुख शहरों में सरकारी जमीन, नजूल भूमि और अन्य सार्वजनिक संपत्तियों का रिकॉर्ड खंगाला जाएगा। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि सरकारी जमीन का वास्तविक क्षेत्रफल कितना है, रिकॉर्ड में उसका दर्ज स्वरूप क्या है और मौके पर उसकी मौजूदा स्थिति कैसी है। भूमि अभिलेखों और जमीन की वास्तविक स्थिति के बीच किसी तरह का अंतर मिलने पर उसकी भी जांच की जाएगी। हाल के महीनों में उत्तर प्रदेश के अलग-अलग शहरों में सरकारी और नजूल भूमि पर अवैध कब्जों के खिलाफ कार्रवाई तेज हुई है। कानपुर में नजूल भूमि से जुड़े मामलों की जांच और सीतापुर में लंबे समय से कब्जे वाली सरकारी संपत्ति को प्रशासन द्वारा अपने नियंत्रण में लेने जैसी कार्रवाइयां भी सामने आई हैं।
भूमि ऑडिट के दौरान सरकारी जमीन से जुड़े पुराने रिकॉर्ड, राजस्व दस्तावेज, पट्टे, स्वामित्व संबंधी जानकारी और मौके पर मौजूद निर्माण की स्थिति का मिलान किया जा सकता है। इससे यह पहचानने में मदद मिलेगी कि किन जमीनों पर अवैध निर्माण या कब्जा है और किन संपत्तियों का इस्तेमाल उनकी निर्धारित उपयोगिता के अनुसार नहीं हो रहा है। डिजिटल रिकॉर्ड और जमीन की मैपिंग के जरिए सरकारी संपत्तियों की जानकारी को व्यवस्थित करने पर भी जोर दिया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में सरकारी जमीनों का डिजिटल रिकॉर्ड और लैंड बैंक तैयार करने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे भविष्य में जमीन की निगरानी और उसके उपयोग को अधिक पारदर्शी बनाया जा सके।
इस अभियान का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य सरकारी जमीन को भविष्य में दोबारा अतिक्रमण से बचाना भी है। केवल कब्जा हटाने के बजाय जमीन की पहचान, रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण, सीमांकन और नियमित निगरानी की व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया जा सकता है। हाल में ग्रेटर नोएडा के बिलासपुर क्षेत्र में लगभग 24 हजार वर्गमीटर सरकारी/अधिसूचित जमीन को अवैध प्लॉटिंग से मुक्त कराया गया, जिसकी कीमत करीब 48 करोड़ रुपये बताई गई। इस तरह की कार्रवाइयों से यह स्पष्ट होता है कि प्रशासन सरकारी भूमि पर अवैध निर्माण और कब्जे को लेकर सख्त रुख अपना रहा है।
भूमि ऑडिट पूरा होने के बाद सरकार के पास शहरों में उपलब्ध सरकारी जमीन का अधिक स्पष्ट रिकॉर्ड तैयार हो सकता है। इससे अतिक्रमण वाली जमीनों की पहचान के साथ-साथ भविष्य की विकास परियोजनाओं के लिए उपलब्ध भूमि का बेहतर इस्तेमाल भी संभव होगा। साथ ही, सरकारी संपत्तियों पर कब्जे की शिकायतों पर कार्रवाई करने में प्रशासन को अधिक सटीक जानकारी मिल सकेगी। हालांकि, ऐसे अभियान में पुराने रिकॉर्ड, स्वामित्व विवाद और न्यायालय में लंबित मामलों की सावधानीपूर्वक जांच जरूरी होगी, ताकि वैध कब्जाधारकों और विवादित संपत्तियों के मामलों में उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जा सके। कुल मिलाकर, 17 शहरों में प्रस्तावित भूमि ऑडिट को सरकारी जमीन की सुरक्षा, रिकॉर्ड सुधार और अतिक्रमण पर प्रभावी नियंत्रण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।