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खेलों की अनिवार्यता: स्कूलों में खेलों को बढ़ावा देने की जरूरत, प्राथमिकताओं में बदलाव के कारण पीछे छूटा हरि रंजन राव
देशभर के शैक्षणिक संस्थानों में शारीरिक शिक्षा और खेलकूद की स्थिति को लेकर एक महत्वपूर्ण बात सामने आई है। प्राथमिकताओं में आए बदलाव के कारण आज खेलकूद का क्षेत्र शैक्षणिक संस्थानों में पिछड़ता जा रहा है, जिस पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है।
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Ankit Yadav
26 अग 2026, 13:34
देश के शैक्षणिक तंत्र में शारीरिक गतिविधियों और खेलकूद के घटते स्तर को लेकर एक गंभीर चर्चा छिड़ गई है। हाल ही में सामने आए बयानों के अनुसार, विभिन्न कारणों और प्राथमिकताओं में हुए बड़े बदलावों की वजह से स्कूलों में खेलकूद का माहौल प्रभावित हुआ है। एक समय था जब शिक्षण संस्थानों में मैदानों की रौनक और खेल गतिविधियों को शिक्षा का एक अभिन्न अंग माना जाता था, लेकिन समय के साथ अकादमिक दबाव और अन्य प्राथमिकताओं के आगे खेल पीछे छूटते चले गए। इस स्थिति को सुधारने के लिए अब एक बार फिर से इस दिशा में विशेष ध्यान देने की आवश्यकता महसूस की जा रही है ताकि विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित किया जा सके।
प्राथमिकताओं में बदलाव और शिक्षा प्रणाली
आज के दौर में शिक्षा का मतलब केवलता किताबी ज्ञान और परीक्षाओं में अंक प्राप्त करना तक सीमित होता जा रहा है। अभिभावक और स्कूल प्रबंधन दोनों ही अक्सर केवल शैक्षणिक प्रदर्शन पर अत्यधिक जोर देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप खेलकूद और अन्य पाठ्येतर गतिविधियों के लिए समय और संसाधन दोनों कम होते जा रहे हैं। हरि रंजन राव द्वारा इस विषय पर उठाए गए मुद्दों ने इस बात पर रोशनी डाली है कि किस प्रकार हमारी बदलती प्राथमिकताओं ने शिक्षा के खेल पहलू को हाशिए पर धकेल दिया है। जब तक स्कूलों के बुनियादी ढांचे में खेल को उच्च प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक छात्रों की शारीरिक और मानसिक फिटनेस के स्तर में अपेक्षित सुधार लाना कठिन होगा।
विभिन्न विशेषज्ञों का मानना है कि पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद बच्चों में अनुशासन, टीम वर्क, नेतृत्व क्षमता और संघर्ष करने की कला को विकसित करता है। यदि शुरुआती दौर से ही बच्चों को खेलों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित न किया जाए, तो वे शारीरिक रूप से सक्रिय जीवनशैली से दूर होते जाते हैं। आज के आधुनिक युग में स्क्रीन टाइम बढ़ने के कारण बच्चों की शारीरिक सक्रियता वैसे ही काफी कम हो गई है, ऐसे में स्कूलों की यह जिम्मेदारी और भी अधिक बढ़ जाती है कि वे खेल के मैदानों को गुलजार रखें। खेलकूद के माध्यम से छात्र न केवल तनावमुक्त रहते हैं बल्कि अकादमिक तनाव का सामना करने के लिए भी मानसिक रूप से अधिक मजबूत बनते हैं।
भविष्य की दिशा और सुधार के उपाय
इस गंभीर चुनौती से निपटने के लिए अब नीति निर्माताओं, शिक्षाविदों और स्कूल प्रशासकों को एक साथ मिलकर ठोस रणनीतियाँ बनाने की जरूरत है। विद्यालयों में खेल के मैदानों का आधुनिकीकरण, प्रशिक्षित खेल शिक्षकों की नियुक्ति और नियमित खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन बेहद जरूरी कदम हैं। इसके अलावा, छात्रों और उनके अभिभावकों के बीच खेलकूद के महत्व के प्रति जागरूकता फैलाना भी उतना ही आवश्यक है ताकि वे इसे समय की बर्बादी न मानकर छात्र के जीवन का एक मूल्यवान हिस्सा समझें। आने वाले समय में यदि खेल संस्कृति को दोबारा से बढ़ावा नहीं दिया गया, तो देश की युवा प्रतिभाओं को सही मंच मिलने में कठिनाई आ सकती है। समाज के सभी वर्गों को मिलकर इस दिशा में सकारात्मक प्रयास करने होंगे ताकि हमारे शिक्षण संस्थान एक बार फिर से खेल चैंपियंस को जन्म देने का मुख्य केंद्र बन सकें।