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विदेश

ब्रिक्स समिट नीति: गुट आधारित राजनीति से दूरी बनाए भारत, विशेषज्ञों की अहम सलाह

आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत की भू-राजनीतिक भूमिका को लेकर विशेषज्ञों ने महत्वपूर्ण सलाह दी है, जिसमें गुटबंदी से अलग रहने पर जोर दिया गया है।

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Ankit Yadav
13 सित 2026, 19:43
ब्रिक्स समिट नीति: गुट आधारित राजनीति से दूरी बनाए भारत, विशेषज्ञों की अहम सलाह
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के रणनीतिक रुख को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। आगामी ब्रिक्स समिट के मद्देनजर देश के तमाम कूटनीतिक विशेषज्ञों और विश्लेषकों ने अपनी राय रखनी शुरू कर दी है। जानकारों का साफ तौर पर मानना है कि वैश्विक पटल पर भारत को किसी भी प्रकार की गुट आधारित राजनीति या ध्रुवीकरण का हिस्सा बनने से बचना चाहिए। भारत की हमेशा से एक स्वतंत्र विदेश नीति रही है, जो देश के राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखती है और किसी खास पाले में बंधने से इनकार करती है। विशेषज्ञों के अनुसार, ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय संगठनों में भारत का मुख्य फोकस आर्थिक सहयोग, विकासशील देशों के मुद्दों को उठाने और वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने पर होना चाहिए।

स्वतंत्र विदेश नीति और कूटनीतिक संतुलन

उत्तर प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में भी इस बात को लेकर बहस छिड़ गई है कि बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को कैसे बनाए रखे। पिछले कुछ वर्षों में दुनिया कई खेमों में बंटती नजर आ रही है, ऐसे में भारत के लिए यह बेहद जरूरी हो जाता है कि वह अपनी पारंपरिक 'नॉन-अलाइनमेंट' यानी गुटनिरपेक्षता की भावना और रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता दे। जानकारों का कहना है कि ब्रिक्स जैसे मंच पर भारत का योगदान केवल किसी एक गुट के प्रभाव को बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक बहुध्रुवीयता को बढ़ावा देने के लिए होना चाहिए। लखनऊ और दिल्ली के कूटनीतिक गलियारों में भी इस बात पर मंथन चल रहा है कि ऐसे सम्मेलनों में आर्थिक मुद्दों और आपसी व्यापार पर ज्यादा जोर दिया जाना चाहिए ताकि दुनिया भर में सकारात्मक संदेश जाए। विशेषज्ञों का यह भी तर्क है कि ब्रिक्स संगठन का विस्तार और इसके एजेंडे में बदलाव हो रहा है, जिसमें विभिन्न देशों के अपने हित जुड़े हैं। ऐसे समय में भारत के नीति-निर्माताओं के लिए यह जरूरी है कि वे कूटनीतिक संतुलन साधते हुए ऐसे किसी भी प्रस्ताव से दूरी बनाएं जो देश को किसी विशेष वैचारिक गुट में धकेल सकता हो। भारत की पहचान एक ऐसे जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में है जो तमाम देशों के साथ संतुलित संबंध रखती है—चाहे वह पश्चिमी देश हों या ब्रिक्स के अन्य सदस्य देश। इस संतुलन को बनाए रखने से ही देश का दीर्घकालिक आर्थिक और राजनीतिक हित सुरक्षित रह सकता है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान भारत आधिकारिक तौर पर किन प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाता है और वैश्विक मंच पर देश का यह संतुलित रुख किस प्रकार आकार लेता है। तमाम विश्लेषकों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या भारत एक बार फिर वैश्विक कूटनीति में स्वतंत्र मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हुए आपसी सहयोग और शांति के संदेश को सबसे ऊपर रखता है। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक और शैक्षणिक हलकों में भी इस बात की चर्चा है कि भारत की कूटनीतिक परिपक्वता ही उसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक अलग पहचान दिलाती है, और ब्रिक्स समिट में भी इसी नीति का पालन किया जाना चाहिए।
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