मिसाइल परीक्षण के लिए भारतीय केंद्रों की तलाश
जापान हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति और रक्षा क्षमताओं को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में काम कर रहा है। इसी क्रम में टोक्यो अपनी 1000 किलोमीटर की मारक रेंज वाली टाइप-25 सतह-से-सतह मिसाइलों को आजमाने के लिए भारतीय जमीन का उपयोग करना चाहता है। रक्षा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों के अनुसार जापान भारत के विभिन्न परीक्षण स्थलों का आकलन कर रहा है ताकि भविष्य में लाइव-फायर अभ्यास किया जा सके। इसके अलावा छोटे आकार के हमलावर ड्रोन्स के प्रशिक्षण को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच बातचीत चल रही है। फिलहाल इस योजना पर चर्चा प्रारंभिक स्तर पर है और इसे अंतिम रूप नहीं दिया गया है। अभी तक किसी विशिष्ट रेंज का चयन नहीं हुआ है और न ही किसी विशेष मिसाइल प्रणाली को उपयोग के लिए चिह्नित किया गया है। यह पूरा सहयोग दोनों देशों की रक्षा साझेदारी को एक नई ऊंचाइयों पर ले जाने का एक बड़ा माध्यम बन सकता है।
अधिकारियों के बीच रक्षा सहयोग पर बातचीत
जापान की ग्राउंड सेल्फ-डिफेंस फोर्स के शीर्ष अधिकारी जनरल अराई मसयोशी ने 27 अक्टूबर को इस बात की पुष्टि की है कि भारतीय तंत्र के साथ समन्वय स्थापित करने के लिए अधिकारियों का एक समूह भेजा गया था। जनरल मसयोशी के अनुसार लंबी दूरी की मिसाइलों का अभ्यास करना वर्तमान में उनके लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है और वे अपने देश की सीमाओं से बाहर उचित स्थानों की तलाश कर रहे हैं। हालांकि इस साझेदारी के लिए अभी बहुत से तकनीकी पहलुओं पर गहन विचार किया जाना शेष है। इसमें रेडियो फ्रीक्वेंसी आवंटन, सैन्य अभियानों के संचालन का तरीका, प्रशिक्षण का पूरा ढांचा, सुरक्षित स्थानों का चुनाव और अन्य सुरक्षात्मक नियम शामिल हैं। अधिकारी इस बात का भी बारीकी से अध्ययन कर रहे हैं कि विदेशी जमीन पर होने वाले ये अभ्यास जापान के अपने घरेलू सैन्य प्रशिक्षण कार्यक्रमों के साथ किस प्रकार तालमेल बिठा पाएंगे। फिलहाल कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है क्योंकि जापान हर विकल्प पर सतर्कतापूर्वक विचार कर रहा है।
रक्षा संबंधों का विस्तार और सुरक्षा मंजूरी
हिंद-प्रशांत महासागर क्षेत्र में सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए जापान अपनी मारक क्षमता को आधुनिक बनाने के लिए निरंतर प्रयासरत है। भारत के साथ रक्षा तालमेल बढ़ने से न केवल मिसाइल तकनीक का परीक्षण बेहतर तरीके से हो सकेगा, बल्कि भविष्य के साझा ऑपरेशनों के लिए भी रास्ता साफ होगा। भारत में इन अभ्यासों के आयोजन के लिए कड़ी सुरक्षा मंजूरियां और संचालन संबंधी अनुमतियां हासिल करना प्राथमिकता होगी। इसके अलावा स्वदेशी रक्षा उपकरणों का विकास भी लगातार चर्चा में है, जैसे समुद्री माइंस को नष्ट करने वाली स्वचलित रोबोटिक स्वार्म तकनीक। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि भारत में कब से प्रशिक्षण शुरू होगा या इसमें किन उपकरणों की मुख्य भूमिका रहेगी। लेकिन यह स्पष्ट है कि जापान घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों विकल्पों को समान महत्व दे रहा है। दोनों देशों के बीच की यह रक्षा बातचीत आने वाले समय में रणनीतिक स्तर पर बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।