ओटावा दौरे से पहले बदल रहे हैं कूटनीतिक समीकरण
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बहुप्रतीक्षित ओटावा प्रवास से ठीक पहले कूटनीतिक गलियारों में बड़ी हलचल तेज हो गई है। लंबे समय से ठंडे बस्ते में चल रहे द्विपक्षीय संबंधों में अचानक आई इस तेजी ने वैश्विक राजनीति के जानकारों को भी हैरान कर दिया है। दोनों देशों के शीर्ष राजनयिक स्तर पर कई दौर की गुप्त और औपचारिक बैठकें आयोजित की गई हैं। इन वार्ताओं का मुख्य उद्देश्य आपसी सहयोग के नए द्वार खोलना और पुराने विवादों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ना है। ओटावा में इस उच्च स्तरीय यात्रा को लेकर तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं और सुरक्षा व्यवस्था से लेकर प्रोटोकॉल तक के सभी इंतजामों को पुख्ता किया जा रहा है। भारतीय प्रतिनिधिमंडल के इस महत्वपूर्ण प्रवास से दोनों देशों के बीच विश्वास की एक नई बहाली की उम्मीद की जा रही है जो भविष्य की नीतियों की दिशा तय करेगी।
व्यापार समझौते और व्यापक आर्थिक भागीदारी का समर्थन
भारत और कनाडा के बीच आर्थिक मोर्चे पर आपसी सहमति और व्यापारिक समझौतों को मजबूत करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। दोनों पक्षों ने व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते यानी सीईपीए का जोरदार समर्थन किया है जिससे आने वाले दिनों में मुक्त व्यापार और निवेश के रास्ते चौड़े होंगे। इस व्यवस्था के लागू होने से दोनों देशों के व्यावसायिक घरानों को एक-दूसरे के बाजारों तक सीधी और आसान पहुंच मिलेगी। विशेष रूप से कृषि, तकनीक, ऊर्जा और विनिर्माण के क्षेत्रों में संयुक्त उद्यम स्थापित करने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के समझौतों से दोनों राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और रोजगार के नए अवसरों का सृजन होगा। वाणिज्य मंत्रालयों के अधिकारियों ने इन प्रस्तावों को अंतिम रूप देने के लिए मैराथन बैठकें की हैं ताकि प्रधानमंत्री के दौरे के दौरान इन पर औपचारिक मुहर लगाई जा सके।
वैश्विक मंच पर अमेरिका के लिए उभरती नई रणनीतिक चुनौतियां
कनाडा और भारत के बीच बढ़ती नजदीकियां और व्यापारिक समझौतों पर सहमति के इस घटनाक्रम को पश्चिमी देशों की राजनीति में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। इस पूरी कूटनीतिक कवायद को अमेरिका के लिए एक जोरदार झटका माना जा रहा है क्योंकि वाशिंगटन की क्षेत्रीय और वैश्विक नीतियों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषकों का आकलन है कि उत्तर अमेरिकी क्षेत्र में अमेरिका के पारंपरिक प्रभाव संतुलन को अब कनाडा की स्वतंत्र विदेश नीतियों से नई चुनौती मिल रही है। भारत ने जिस प्रकार से अपने कूटनीतिक दायरे का विस्तार करते हुए कनाडा के साथ संबंधों को प्रगाढ़ किया है, उसने वैश्विक महाशक्तियों को अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। आने वाले समय में इस द्विपक्षीय सुधार के भू-राजनीतिक और आर्थिक प्रभावों का पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर गहरा असर पड़ना तय माना जा रहा है।