वैश्विक मानचित्र पर भारत की वर्तमान स्थिति
धरती के भूवैज्ञानिक इतिहास और प्राकृतिक धरोहरों को संजोने के मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं। दुनिया भर के विभिन्न देशों में फैले हुए कुल 241 वैश्विक जियो पार्क इस दिशा में एक बड़ा उदाहरण पेश कर रहे हैं। वर्तमान समय में दुनिया के 51 अलग-अलग देशों में यह प्रतिष्ठित दर्जा प्राप्त स्थल मौजूद हैं। हालांकि इस वैश्विक मानचित्र पर नजर डाली जाए तो सबसे बड़े और विविधतापूर्ण देशों में शुमार भारत के हिस्से में फिलहाल निराशा ही हाथ लगी है। हमारे देश में एक भी ऐसा भूवैज्ञानिक स्थल मौजूद नहीं है जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह मान्यता प्राप्त हो सकी हो। इस स्थिति को बदलने के लिए अब विभिन्न संस्थाओं और स्तरों पर गंभीर प्रयास शुरू किए जा चुके हैं ताकि देश की भू-विरासत को दुनिया के सामने लाया जा सके और इस कमी को दूर किया जा सके।
मान्यता प्राप्त करने के लिए चल रहे प्रयास
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित पहचान हासिल करने की इस प्रक्रिया में कई महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक स्थल शामिल किए जा रहे हैं। भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक धरोहर न्यास यानी इन्टाच संस्था इस दिशा में लगातार सक्रिय रूप से जुटी हुई है। आंध्र प्रदेश के क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध लाल रेत के टीले जिन्हें एर्रा मट्टी डिब्बालू के नाम से जाना जाता है, इस सूची में शामिल होने की दौड़ में हैं। इसके अलावा अपनी प्राचीन बनावट और प्राकृतिक सुंदरता के लिए विख्यात बोर्रा गुफाओं को भी इस विशेष श्रेणी में शामिल कराने के लिए पुरजोर कोशिशें की जा रही हैं। इसके अतिरिक्त 750 करोड़ साल पुरानी चट्टानों पर खड़े मेहरानगढ़ के किले को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं ताकि इसे देश के पहले ऐसे पार्क के रूप में स्थापित किया जा सके। इन सभी स्थलों के माध्यम से देश की अनूठी भू-संरचना को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने की रूपरेखा तैयार की जा रही है।
क्या होती है इस विशेष दर्जे की अवधारणा
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस विशेष श्रेणी की शुरुआत वर्ष 2015 में इंटरनेशनल जियोसाइंस एंड जियो पार्क प्रोग्राम के अंतर्गत की गई थी। इसके नियमों के मुताबिक यह ऐसे एकल और पूरी तरह से जुड़े हुए भौगोलिक क्षेत्र होते हैं जहां अंतरराष्ट्रीय महत्व के भूवैज्ञानिक परिदृश्य मिलते हैं। इन क्षेत्रों में ऐसी पूरी सामग्री और अवधारणा उपलब्ध होनी चाहिए जिससे लोगों को पृथ्वी के इतिहास को समझने में मदद मिल सके। इसके साथ ही इन जगहों पर भूवैज्ञानिक परिदृश्यों के संरक्षण, शिक्षा को बढ़ावा देने और सतत विकास के सिद्धांतों को अनिवार्य रूप से लागू किया जाना चाहिए। वर्ष 2025 में इस कार्यक्रम के एक दशक पूरा होने के मौके पर दुनिया भर के 11 देशों के 16 चुनिंदा स्थानों को इस सूची में जोड़ा गया था। नियमों के अनुसार यह स्थान प्राकृतिक और सांस्कृतिक विशेषताओं का उपयोग करके जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं जैसे मुद्दों के प्रति जागरूकता बढ़ाने में बहुत उपयोगी साबित होते हैं।