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विश्व बांस दिवस विशेष: पीढ़ियों से रिंगाल बुन रहे पारंपरिक शिल्पकार, बाजार तक पहुंच अभी भी सीमित
विश्व बांस दिवस के अवसर पर पारंपरिक रिंगाल शिल्पकारों की कला और उनकी गंभीर समस्याओं पर विशेष चर्चा सामने आई है, जहां पीढ़ियों से इस हुनर को जीवित रखने वाले कारीगर आज भी बड़े बाजारों तक अपनी पहुंच न होने के कारण संघर्ष कर रहे हैं।
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Ankit Yadav
18 सित 2026, 11:24
विश्व बांस दिवस के मौके पर एक बार फिर से उन पारंपरिक दस्तकारों और शिल्पकारों की सुध ली जा रही है जो दशकों और पीढ़ियों से बांस की एक खास प्रजाति यानी रिंगाल से बेहतरीन और उपयोगी वस्तुएं तैयार करते आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पहाड़ी व मैदानी इलाकों में फैले इस पारंपरिक कुटीर उद्योग से जुड़े लोगों का जीवन पीढ़ियों से इसी कला पर निर्भर रहा है। ये कारीगर अपनी उंगलियों के कमाल से रिंगाल की पतली खपच्चियों को तराशकर टोकरियाँ, सूप, चटाइयाँ और कई प्रकार की घरेलू तथा सजावटी वस्तुएं बनाते हैं। इस कला में अद्भुत बारीकी और मेहनत की आवश्यकता होती है, जिसे इन परिवारों ने अपनी आने वाली पीढ़ियों को विरासत के रूप में सौंपा है।
बाजार की कमी और आधुनिकता की मार
हालांकि यह हस्तशिल्प अपनी मजबूती और पर्यावरण के अनुकूल प्रकृति के लिए जाना जाता है, लेकिन इसके बावजूद बुनकरों के सामने सबसे बड़ा संकट आधुनिक बाजारों तक सीधी पहुँच न होना है। आज के उपभोक्ता दौर में प्लास्टिक और अन्य सिंथेटिक उत्पादों ने पारंपरिक बांस और रिंगाल के सामानों की जगह ले ली है, जिससे इन स्थानीय कारीगरों की आय बेहद सीमित हो गई है। बिचौलियों की मौजूदगी के कारण असली कलाकारों को उनकी मेहनत का उचित मेहनताना नहीं मिल पाता है। ग्रामीण इलाकों में बैठे इन बुनकरों के पास डिजिटल मार्केटिंग, बड़े पैमाने पर ब्रांडिंग और आधुनिक डिजाइनिंग के संसाधनों का भारी अभाव है, जिसके कारण उनकी उत्कृष्ट कला स्थानीय हाट बाजारों से आगे नहीं बढ़ पाती है।
सरकारी मदद और भविष्य की उम्मीदें
शिल्पकारों और जानकारों का मानना है कि यदि सरकार और संबंधित विभाग मिलकर इन पारंपरिक दस्तकारों के लिए विशेष प्रशिक्षण शिविर, क्लस्टर आधारित विकास योजनाएं और बड़े शहरी बाजारों में प्रदर्शनियों का आयोजन करें, तो स्थिति काफी हद तक सुधर सकती है। उत्तर प्रदेश और आसपास के क्षेत्रों में हस्तशिल्प बोर्ड लगातार ऐसी योजनाओं को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहा है, ताकि लखनऊ और अन्य बड़े महानगरों के खरीदार सीधे इन ग्रामीण कलाकारों तक पहुँच सकें। इसके अलावा, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से इनके उत्पादों को ग्लोबल मार्केट उपलब्ध कराने की दिशा में भी काम करने की सख्त जरूरत है।
जब तक इन मेहनती हाथों को सीधा और पारदर्शी बाजार नहीं मिलेगा, तब तक इस प्राचीन कला को सहेजकर रखना और कारीगरों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाना एक बड़ी चुनौती बना रहेगा। विश्व बांस दिवस जैसे विशेष अवसरों पर केवल चर्चा करने के बजाय धरातल पर ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है, ताकि रिंगाल बुनकरों का यह हुनर आने वाले समय में भी जीवित रह सके और उनकी पीढ़ियों को उनका वास्तविक अधिकार मिल सके।