श्री अर्धनारीश्वर मंदिर की अनोखी परंपरा
भारत में सनातन परंपरा से जुड़े कई ऐसे प्राचीन और अनोखे मंदिर मौजूद हैं जो अपनी विशिष्ट मान्यताओं के कारण देश-दुनिया में अपनी अलग पहचान रखते हैं। ऐसा ही एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल केरल राज्य के मलप्पुरम जिले के अरक्कुपरम्बा क्षेत्र में स्थित है जिसे श्री अर्धनारीश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह पावन मंदिर पेरिनथलमन्ना से लगभग 17 किलोमीटर की दूरी पर स्थापित है और यहां आने वाले श्रद्धालुओं को एक बेहद हैरान करने वाली परंपरा देखने को मिलती है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां का पवित्र शिवलिंग है जो सामान्य दिनों में साल के 364 दिन लगातार पानी के भीतर डूबा रहता है। आम दिनों में मंदिर परिसर और गर्भगृह के भीतर जल भरा रहता है जिस कारण भगवान शिव के इस स्वरूप के दर्शन सामान्य समय में संभव नहीं हो पाते हैं। हालांकि जैसे ही महाशिवरात्रि का पवित्र त्योहार आता है, मंदिर प्रबंधन द्वारा परिसर से सारा पानी बाहर निकाला जाता है। पानी पूरी तरह निकाले जाने के बाद ही सभी भक्तगण भगवान शिव के इस अद्भुत और पावन स्वरूप के सीधे दर्शन कर पाते हैं। मंदिर तक पहुंचने वाला पानी से घिरा हुआ रास्ता भी इस संपूर्ण धार्मिक स्थल को अन्य जगहों से पूरी तरह अलग और विशिष्ट बनाता है।
विशेष पूजा और वैवाहिक जीवन की कामना
इस पवित्र मंदिर में मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती के संयुक्त और अद्वितीय स्वरूप यानी अर्धनारीश्वर की विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती है। मंदिर परिसर में आने वाले बड़ी संख्या में भक्तगण भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए लंबी कतारों में खड़े होते हैं। ऐसी गहरी धार्मिक मान्यता प्रचलित है कि इस मंदिर में सच्चे मन से पूजा करने से विवाह में आने वाली तमाम प्रकार की बाधाएं हमेशा के लिए दूर हो जाती हैं। इसके साथ ही विवाहित जोड़े अपने वैवाहिक जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना लेकर यहां विशेष रूप से पहुंचते हैं। मंदिर के अंदर संपन्न होने वाली खास धार्मिक पूजाओं में प्रसिद्ध उमा महेश्वर पूजा का नाम सबसे प्रमुखता से लिया जाता है। भक्त इस विशेष अनुष्ठान और पूजा के माध्यम से अपने विवाह में आ रही सभी परेशानियों को समाप्त करने की प्रार्थना करते हैं। इसके अलावा पति-पत्नी के बीच आपसी प्रेम, अटूट विश्वास और बेहतर समझ बनाए रखने के लिए भी विशेष कामना की जाती है। मंदिर के विभिन्न त्योहारों के दौरान पट्टुम थालियुम समरप्पणम नाम का एक बहुत ही महत्वपूर्ण अनुष्ठान भी धूमधाम से आयोजित किया जाता है। इस विशेष अनुष्ठान में भाग लेकर सभी भक्त अपने सुखी, समृद्ध और खुशहाल वैवाहिक जीवन की मंगल कामना करते हैं।
वार्षिक उत्सव और मंदिर तक पहुंचने के मार्ग
इस प्रसिद्ध मंदिर में सालभर कई तरह के धार्मिक आयोजन और बड़े उत्सव बड़ी धूमधाम के साथ मनाए जाते हैं। मंदिर में हर साल दिसंबर या महीने के जनवरी के दौरान पांच दिनों तक चलने वाला एक भव्य वार्षिक उत्सव आयोजित किया जाता है। इस पांच दिवसीय उत्सव की शुरुआत पारंपरिक तरीके से ध्वजारोहण के साथ होती है और इसका समापन थिरु अरट्टू नामक पवित्र अनुष्ठान के साथ संपन्न होता है। इसके अलावा हर साल जून या जुलाई के महीने में भी एक खास धार्मिक आयोजन मंदिर परिसर में किया जाता है। इस दौरान विशेष पूजा के साथ ही 1008 कलश जलाभिषेक का भव्य अनुष्ठान पूरे विधि-विधान से पूरा किया जाता है। इस विशेष अनुष्ठान के तहत 1008 कलशों के पवित्र जल से भगवान का जलाभिषेक किया जाता है। यदि कोई श्रद्धालु इस मंदिर के दर्शन करने की इच्छा रखता है तो उसे आने से पहले मंदिर के निश्चित समय की जानकारी अवश्य प्राप्त कर लेनी चाहिए। यह मंदिर सुबह के समय 6 बजे से 9:30 बजे तक और शाम के समय 4 बजे से 7 बजे तक नियमित रूप से खुला रहता है। यहां आने वाले सभी भक्तों की सुविधा के लिए मंदिर प्रशासन द्वारा मुफ्त भोजन की उत्तम व्यवस्था भी की जाती है। इस मंदिर तक सड़क, रेल और हवाई मार्ग के माध्यम से बहुत ही आसानी से पहुंचा जा सकता है। हवाई मार्ग से आने वाले यात्रियों के लिए कालीकट अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा मंदिर से लगभग 40 से 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जहां से टैक्सी लेकर सीधे पहुंचा जा सकता है। रेल मार्ग के जरिए आने वाले भक्तों के लिए अंगडीपुरम रेलवे स्टेशन मंदिर के पास ही स्थित है जहां से टैक्सी, ऑटो-रिक्शा या बस की मदद से आसानी से मंदिर तक पहुंच सकते हैं।