मंदिरों में अंधेरा और बजट का संकट
राजस्थान में दीपोत्सव जैसे बड़े पर्व के अवसर पर मंदिरों में रोशनी और विशेष आयोजनों की व्यवस्था पूरी तरह से ठप हो गई है। राज्य के विभिन्न प्रमुख धार्मिक स्थलों पर दीपोत्सव के लिए आवंटित बजट समय पर जारी नहीं होने के कारण भगवान के दरबार अंधेरे में डूबे हुए हैं। 29 अक्टूबर 2026 की स्थिति के अनुसार, त्योहार के इतने करीब आकर भी धनराशि का प्रबंध न होना प्रशासन की बड़ी विफलता को दर्शाता है। आमतौर पर दीवाली के समय मंदिरों को विशेष रूप से सजाया जाता है और भव्य दीप प्रज्ज्वलन के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। हालांकि, इस बार धन के अभाव ने इन सभी धार्मिक अनुष्ठानों को रोक दिया है। स्थानीय स्तर पर हो रही इस प्रशासनिक देरी ने आम श्रद्धालुओं के मन में गहरी नाराजगी पैदा कर दी है। मंदिरों के पुजारियों और प्रबंधन समितियों को यह समझ नहीं आ रहा है कि आखिरी समय में इतने बड़े आयोजन के लिए संसाधनों की व्यवस्था कैसे की जाए। इस प्रकार की अव्यवस्था ने राज्य भर के मंदिरों में उत्सव के माहौल को फीका कर दिया है।
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की घेराबंदी
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस संवेदनशील मुद्दे पर सरकार को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि धार्मिक आयोजनों के लिए बजट का अटकना सरकार की उपेक्षापूर्ण नीति का परिणाम है। गहलोत ने स्पष्ट किया कि जब पूरे राज्य में दीपोत्सव की तैयारी चल रही है, तब मंदिरों के लिए धन का अभाव समझ से परे है। उन्होंने सरकार से इस देरी के पीछे के कारणों का जवाब मांगा है और तत्काल प्रभाव से बजट जारी करने की मांग रखी है ताकि मंदिरों में रोशनी की जा सके। गहलोत की यह प्रतिक्रिया सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा कर रही है, क्योंकि यह मामला सीधे तौर पर जन भावनाओं और आस्था से जुड़ा हुआ है। विपक्षी नेता होने के नाते उन्होंने इस मुद्दे के माध्यम से प्रशासन की कार्यदक्षता पर सीधा हमला किया है। यह देखना महत्वपूर्ण है कि क्या उनके इस दबाव के बाद सरकार कोई त्वरित कदम उठाती है या फिर मंदिरों को इस बार अंधेरे में ही उत्सव मनाना पड़ेगा।
बजट प्रक्रिया और दीपोत्सव का महत्व
भारत में दीपोत्सव का त्योहार न केवल सामाजिक बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। सरकारी व्यवस्था में मंदिरों के रखरखाव और विशेष आयोजनों के लिए अलग से बजट प्रावधान किए जाते हैं, जिन्हें समय पर वितरित करना जिला प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए। प्रशासनिक प्रक्रियाओं में देरी अक्सर सरकारी फाइलों के बीच उलझने के कारण होती है, जिसका सीधा असर आम जनता तक पहुंचने वाली सेवाओं पर पड़ता है। दीपोत्सव जैसे त्योहारों के लिए बजट मंजूरी की प्रक्रिया काफी पहले शुरू हो जानी चाहिए थी ताकि अंतिम क्षणों में कोई बाधा न आए। इस घटना ने एक बार फिर सरकारी मशीनरी की सुस्त गति को उजागर किया है, जिससे राज्य के सांस्कृतिक और धार्मिक ढांचे पर असर पड़ता है। मंदिरों का महत्व केवल पूजा स्थल के रूप में ही नहीं, बल्कि सामाजिक एकता के केंद्र के रूप में भी होता है, जहां लोग बड़ी संख्या में इकट्ठा होते हैं। यदि समय रहते इन वित्तीय बाधाओं को दूर नहीं किया गया, तो यह राज्य के धार्मिक प्रबंधन के प्रति सरकार की गंभीरता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा देगा। अब श्रद्धालुओं को उम्मीद है कि प्रशासन इस बजट संकट को जल्द सुलझाएगा।