बाजार में सजे दीयों के नए और पारंपरिक विकल्प
त्योहार के इस सीजन में खरीदारी के लिए विभिन्न प्रकार के दीप बाजार में पहुंच चुके हैं। पारंपरिक रूप से उपयोग होने वाले मिट्टी के बर्तनों के अलावा मोम से बने दीप भी अच्छी मात्रा में उपलब्ध हैं। आधुनिक समय की पसंद को ध्यान में रखते हुए अब लोग बिजली से चलने वाले और प्लास्टिक सामग्री से बने दीपों को भी खरीद रहे हैं। समय के साथ घरों को रोशन करने और सजाने के तौर-तरीकों में काफी बदलाव आया है। ग्राहक अपनी व्यक्तिगत पसंद और अपने तय किए गए बजट के अनुसार सामान खरीद रहे हैं। कोई साधारण दीप चुन रहा है तो कोई सजावट के अन्य आधुनिक विकल्पों पर जोर दे रहा है। बाजार की इस विविधता में हर वर्ग के खरीददार के लिए कुछ न कुछ नया जरूर मिल रहा है। व्यापारी भी ग्राहकों की मांग को देखते हुए अपने यहां सभी प्रकार का सामान उपलब्ध करा रहे हैं ताकि त्योहारी सीजन में बिक्री अच्छी हो सके।
घोंचा टोला की महिलाओं द्वारा गोबर से दीयों का निर्माण
इस बार स्थानीय स्तर पर एक खास पहल देखने को मिल रही है जो सभी का ध्यान खींच रही है। शहर के घोंचा टोला में रहने वाली आदिवासी महिलाएं अपने हाथों से गाय के गोबर की मदद से खूबसूरत दीप तैयार कर रही हैं। इन महिलाओं की इस रचनात्मकता और कड़ी मेहनत से तैयार उत्पाद बाजार में बिकने के लिए आ रहे हैं। ये महिलाएं बेहद साधारण छोटे आकार के सामान से लेकर बहुत ही आकर्षक सजावटी सामग्री अपने कौशल से बना रही हैं। इन उत्पादों की कीमत की बात करें तो इन्हें न्यूनतम 20 रुपये से लेकर अधिकतम 50 रुपये के दायरे में रखा गया है। ग्राहकों की पसंद, उनकी बनावट और सजावट की विभिन्न शैलियों के आधार पर इनके दाम तय किए जा रहे हैं। कम पैसे वाले छोटे विकल्प से लेकर महंगे सजावटी उत्पाद तक सब कुछ बाजार में उपलब्ध है। इन महिलाओं की इस भागीदारी से त्योहार के समय स्थानीय उत्पादों को एक बेहतरीन मंच मिल रहा है।
पारंपरिक कला को बढ़ावा और पूजा स्थल की सजावट
त्योहार के दिनों में घरों के अंदर दीप जलाने के साथ-साथ विशेष तौर पर पूजा स्थल और मुख्य द्वार को सजाने का चलन है। लोग अपनी जरूरत के मुताबिक इन खास उत्पादों को खरीदकर अपने घरों के हर कोने को रोशन कर रहे हैं। बाजार में एक तरफ जहां आधुनिक और चमकीले विकल्प मौजूद हैं वहीं दूसरी तरफ यह पारंपरिक शैली के उत्पाद भी अपनी मजबूत जगह बना रहे हैं। घोंचा टोला की महिलाओं द्वारा की जा रही यह मेहनत स्थानीय हुनर को एक नया मुकाम और एक नई पहचान दे रही है। इस प्रकार की पहल से ग्रामीण और आदिवासी महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत होने के साथ-साथ पारंपरिक कला भी जीवित रहती है। खरीदार भी आधुनिकता के इस दौर में पर्यावरण के अनुकूल और स्वदेशी उत्पादों को अपनाकर काफी उत्साहित नजर आ रहे हैं। आने वाले दिनों में इस तरह के हस्तनिर्मित और पर्यावरण हितैषी उत्पादों की मांग बाजार में और अधिक बढ़ने की पूरी संभावना जताई जा रही है।