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धर्म

विशेष संयोग: हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी एक ही दिन

सनातन धर्म में इस वर्ष एक बेहद दुर्लभ और विशेष ज्योतिषीय संयोग बन रहा है, जहां हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी का पावन पर्व एक ही तिथि पर पड़ रहा है।

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Ankit Yadav
14 सित 2026, 12:00
विशेष संयोग: हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी एक ही दिन
सनातन धर्म के पंचांग और ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार इस बार का त्योहारी सीजन बेहद खास रहने वाला है। ऐसा दुर्लभ संयोग बहुत कम देखने को मिलता है जब दो बड़े व्रत और उत्सव एक ही दिन एक साथ मनाए जाएं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हरतालिका तीज के दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए कठोर निर्जला उपवास रखती हैं, जबकि गणेश चतुर्थी विघ्नहर्ता भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में पूरे देश में अत्यधिक हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है। इन दोनों ही पर्वों का सनातन संस्कृति में विशेष स्थान है और इनके एक ही दिन पड़ने से भक्तों का उत्साह दोगुना हो गया है।

व्रत और पूजा के विशेष विधान

भक्तों के मन में इस बात को लेकर काफी असमंजस और उत्सुकता है कि एक ही दिन दोनों पर्वों की पूजा किस प्रकार संपन्न की जाए। ज्योतिष आचार्यों का कहना है कि दोनों ही पर्वों के लिए अलग-अलग मुहूर्त और विधान निर्धारित हैं, जिनका पालन करके व्रती और श्रद्धालु दोनों ही उत्सवों का पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। हरतालिका तीज की पूजा मुख्य रूप से प्रदोष काल में की जाती है, जिसमें माता पार्वती और भगवान शिव की विधि-विधान से आराधना का विधान है। वहीं दूसरी ओर, गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर गणेश जी की प्रतिमा की स्थापना करके मध्याह्न काल में उनकी पूजा और आरती की जाती है। दोनों ही पर्वों के एक ही दिन आने के कारण मंदिरों और घरों में विशेष तैयारियां चल रही हैं। धार्मिक दृष्टिकोण से इस विशेष संयोग को बहुत ही शुभ और फलदायी माना जा रहा है। विद्वानों का मानना है कि एक ही दिन भगवान गणेश और शिव-पार्वती परिवार की एक साथ आराधना करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। इस दुर्लभ योग के कारण बाजारों में भी काफी चहल-पहल देखने को मिल रही है। लोग पूजा-पाठ की सामग्री, नए वस्त्र, पूजन के बर्तन और गणेश जी की मूर्तियों की खरीदारी के लिए बाजारों का रुख कर रहे हैं। विशेषकर उत्तर प्रदेश, लखनऊ और आसपास के क्षेत्रों में इस दोहरे पर्व को लेकर महिलाओं और युवाओं में भारी उत्साह का माहौल बना हुआ है। सार्वजनिक और पारिवारिक स्तर पर इस अवसर को मनाने के लिए बड़े पैमाने पर योजनाएं बनाई जा रही हैं। कई स्थानों पर सामूहिक पूजन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जा रहा है ताकि इस दुर्लभ दिन की महत्ता को और अधिक बढ़ाया जा सके। जानकारों का कहना है कि व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को अपने स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखते हुए दोनों पर्वों की पूजा के नियमों का पालन करना चाहिए। इस प्रकार यह दिन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बन रहा है बल्कि पूरे समाज में आपसी प्रेम, उल्लास और भाईचारे का संदेश भी दे रहा है।
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