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शिक्षा

बढ़ता नशे का खतरा: स्कूली किशोरों के बीच मोबाइल इंटरनेट से स्थिति गंभीर

हाल ही में किशोरों पर किए गए एक नए अध्ययन में चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं, जिसके मुताबिक शैक्षणिक संस्थानों और परिसरों के आसपास युवाओं में नशीले पदार्थों का प्रचलन खतरनाक स्तर तक पहुंच रहा है।

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Ankit Yadav
08 सित 2026, 16:06
बढ़ता नशे का खतरा: स्कूली किशोरों के बीच मोबाइल इंटरनेट से स्थिति गंभीर
देशभर के शैक्षणिक संस्थानों और युवा वर्ग पर मंडरा रहे खतरों को लेकर हाल ही में एक नया अध्ययन सामने आया है, जिसमें स्कूल जाने वाले किशोरों के बीच नशे की बढ़ती प्रवृत्ति को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है। अध्ययन के निष्कर्षों के अनुसार, आधुनिक तकनीक और डिजिटल साधनों ने इस संकट को और अधिक गहरा कर दिया है, विशेष तौर पर मोबाइल इंटरनेट के अंधाधुंध इस्तेमाल ने बच्चों को गलत राह की तरफ धकेलने में बड़ी भूमिका निभाई है। युवा पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा वर्चुअल दुनिया में अधिक समय बिता रहा है, जहां उन्हें इस तरह की बुरी आदतों और असामाजिक गतिविधियों के संपर्क में आने के अवसर आसानी से मिल जाते हैं।

गुवाहाटी में हालात सबसे ज्यादा चिंताजनक

देश के विभिन्न हिस्सों से मिल रही इन रिपोर्ट्स के बीच पूर्वोत्तर के प्रमुख महानगर गुवाहाटी से आई स्थिति विशेष तौर पर भयावह बताई जा रही है। स्थानीय स्तर पर किए गए अवलोकनों और विश्लेषणों से यह बात खुलकर सामने आई है कि गुवाहाटी के कई स्कूलों के आसपास के इलाकों में किशोरों के बीच नशे की गिरफ्त में आने के मामले तेजी से बढ़े हैं। प्रशासन और शिक्षाविदों के लिए यह परिस्थिति एक बड़ी चुनौती बन चुकी है, क्योंकि कम उम्र के बच्चे बहुत जल्दी इन जानलेवा लतों का शिकार हो रहे हैं। अध्ययन में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि यदि इस समस्या पर समय रहते कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में इसके परिणाम बेहद विनाशकारी साबित हो सकते हैं। मोबाइल इंटरनेट की सुलभता और सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स के जरिए इस प्रकार की अवैध गतिविधियों और नशीले पदार्थों के स्रोतों तक किशोरों की पहुंच बेहद आसान हो गई है। बच्चे बिना किसी उचित देखरेख के स्मार्टफोन का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे वे साइबर बुलिंग के साथ-साथ कई तरह के मानसिक और मनोवैज्ञानिक तनावों का भी सामना कर रहे हैं। इन तमाम मानसिक दबावों से उबरने का गलत रास्ता तलाशते हुए कई बार किशोर नशे की दलदल में उतर जाते हैं। अभिभावकों के लिए यह एक चेतावनी है कि वे अपने बच्चों की डिजिटल गतिविधियों पर कड़ी नजर रखें और उनके साथ संवाद स्थापित करें ताकि उन्हें इस प्रकार की संगति से बचाया जा सके। विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए केवल प्रशासनिक कार्रवाई या पुलिस की गश्त ही काफी नहीं है, बल्कि इसके लिए माता-पिता और शिक्षकों को मिलकर एक मजबूत सामाजिक ताना-बाना तैयार करना होगा। स्कूलों के अंदर विशेष परामर्श सत्र आयोजित किए जाने चाहिए ताकि बच्चों को इंटरनेट के दुष्प्रभावों और नशे की विभीषिका के बारे में जागरूक किया जा सके। समाज के सभी वर्गों को मिलकर इस दिशा में ठोस पहल करनी होगी ताकि देश के भविष्य यानी हमारे किशोरों को इस दलदल से सुरक्षित बाहर निकाला जा सके और उन्हें एक स्वस्थ तथा सकारात्मक जीवनशैली की ओर प्रेरित किया जा सके।
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