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बड़ी चिंता: जयपुर में 80 फीसदी सरकारी स्कूलों तक नहीं पहुंच पाई डिजिटल शिक्षा
राजस्थान की राजधानी जयपुर से सामने आई एक चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार, जिले के भारी-भरकम संख्या में सरकारी स्कूल अभी भी आधुनिक तकनीक और डिजिटल शिक्षा से कोसों दूर हैं, जिससे शिक्षा के स्तर पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
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Ankit Yadav
27 अग 2026, 19:05
शिक्षा के आधुनिकीकरण और डिजिटलीकरण के तमाम दावों के बीच जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, राजधानी जयपुर के लगभग अस्सी प्रतिशत सरकारी विद्यालय अभी भी डिजिटल शिक्षा के दायरे से बाहर हैं। तकनीकी युग में जहां हर क्षेत्र को डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने की बात कही जा रही है, वहीं स्कूली शिक्षा के बुनियादी ढांचे में यह बड़ी खाई चिंता का विषय बनती जा रही है। छात्र-छात्राओं को आधुनिक तकनीक से लैस करने के बड़े-बड़े वादे फाइलों तक ही सीमित नजर आ रहे हैं, जिसका सीधा असर विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य और तकनीकी दक्षता पर पड़ रहा है।
19,600 से अधिक स्कूलों में अंधेरा
सरकार की ओर से डिजिटल इंडिया और डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन उनका असर धरातल पर नजर नहीं आ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, जयपुर के करीब 19,600 सरकारी स्कूलों में अभी भी डिजिटल शिक्षा की पहुंच नहीं हो सकी है। इन संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चे आज भी पारंपरिक और पुरानी शिक्षण पद्धतियों पर निर्भर रहने को मजबूर हैं। कंप्यूटर लैब, स्मार्ट क्लासरूम और इंटरनेट जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव इन विद्यालयों में साफ तौर पर देखा जा सकता है। जब तक इन दूरदराज और ग्रामीण या शहरी इलाकों के सरकारी विद्यालयों में तकनीकी संसाधनों का विस्तार नहीं किया जाता, तब तक समान शिक्षा और डिजिटल क्रांति के सपने को पूरा करना बेहद मुश्किल साबित होगा।
विशेषज्ञों और शिक्षाविदों का मानना है कि आज के दौर में तकनीक के बिना शिक्षा अधूरी है। वैश्विक स्तर पर हो रहे बदलावों के साथ कदमताल करने के लिए विद्यार्थियों को शुरुआती कक्षाओं से ही कंप्यूटर और डिजिटल टूल्स से परिचित कराना बेहद जरूरी है। लेकिन जयपुर के अधिकांश सरकारी स्कूलों की स्थिति इसके विपरीत है। पर्याप्त बजट और योजनाओं के बावजूद जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन की सुस्ती इन आंकड़ों के पीछे मुख्य वजह बताई जा रही है। प्रशासनिक स्तर पर लगातार उठने वाले सवालों के बाद अब यह देखना अहम होगा कि संबंधित विभाग इस खाई को पाटने के लिए क्या ठोस कदम उठाता है।
इस मामले के सामने आने के बाद अभिभावकों और विभिन्न छात्र संगठनों में भी रोष व्याप्त है। उनका कहना है कि निजी स्कूलों के मुकाबले सरकारी स्कूलों के बच्चों को जानबूझकर पिछड़ने दिया जा रहा है, क्योंकि उन्हें आधुनिक संसाधनों का लाभ नहीं मिल पा रहा है। आने वाले दिनों में यदि इन 19,600 से अधिक सरकारी विद्यालयों में कंप्यूटर और इंटरनेट की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं की गई, तो यह खाई और अधिक चौड़ी हो जाएगी। शिक्षा विभाग को अब युद्ध स्तर पर काम करते हुए इन स्कूलों में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने की सख्त जरूरत है ताकि हर छात्र को बिना किसी भेदभाव के आधुनिक शिक्षा का अवसर मिल सके।