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शिक्षा

शिक्षा का बढ़ता बाजारीकरण: स्कूली पढ़ाई से लेकर उच्च शिक्षा तक आसमान छूती फीस पर डॉ. अरुणा शर्मा की तीखी टिप्पणी

देश में लगातार महंगी होती शिक्षा प्रणाली और उससे आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर एक नया और महत्वपूर्ण कॉलम सामने आया है, जिसमें व्यवस्था पर गहरी चिंता जताई गई है।

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Ankit Yadav
26 अग 2026, 17:24
शिक्षा का बढ़ता बाजारीकरण: स्कूली पढ़ाई से लेकर उच्च शिक्षा तक आसमान छूती फीस पर डॉ. अरुणा शर्मा की तीखी टिप्पणी
देशभर में उच्च शिक्षा और स्कूली पढ़ाई के क्षेत्र में जिस प्रकार से लगातार खर्च बढ़ता जा रहा है, उसने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। आज के समय में अच्छी तालीम हासिल करना केवल एक सपना बनकर रह गया है, क्योंकि सामान्य परिवारों के लिए इसके दाम चुका पाना बेहद मुश्किल होता जा रहा है। इसी बर्निंग मुद्दे पर वरिष्ठ टिप्पणीकार डॉ. अरुणा शर्मा ने अपने हालिया कॉलम के माध्यम से बहुत ही गंभीर और विचारणीय प्रश्न खड़े किए हैं। उनका यह लेख इस बात पर गहराई से प्रकाश डालता है कि यदि ज्ञान अर्जन की प्रक्रिया इसी प्रकार महंगी होती चली गई, तो आखिरकार देश के नौनिहाल और युवा अपना भविष्य कैसे संवार पाएंगे।

शिक्षा का व्यावसायिकरण और आम आदमी की मुश्किलें

आज के दौर में प्राइवेट संस्थानों से लेकर कोचिंग संस्थानों तक, हर जगह फीस के आंकड़े आसमान छू रहे हैं। गुणवत्तापूर्ण ज्ञान अब एक लग्जरी वस्तु बनता जा रहा है, जिसे खरीदने की ताकत केवल संपन्न वर्ग के पास ही बची है। इस स्थिति के कारण समाज का एक बड़ा और वंचित वर्ग इस दौड़ में पीछे छूटता जा रहा है। डॉ. अरुणा शर्मा ने अपने आलेख में इसी विडंबना को रेखांकित करते हुए समाज के हर वर्ग के लिए समान और सुलभ शिक्षण व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो मेधावी छात्र केवल आर्थिक तंगी के कारण अपनी प्रतिभा का सही उपयोग करने से वंचित रह जाएंगे, जिसका सीधा असर राष्ट्र के समग्र विकास पर पड़ेगा। सरकार और नीति निर्माताओं को इस विषय पर बेहद गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है ताकि इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाए जा सकें। स्कूली स्तर से लेकर यूनिवर्सिटी तक बढ़ती कीमतों पर लगाम कसना अब समय की सबसे बड़ी मांग बन चुका है। केवल सरकारी दावों से जमीनी हकीकत नहीं बदल सकती, बल्कि इसके लिए पारदर्शी नीतियों और मजबूत नियंत्रण की जरूरत है। डॉ. अरुणा शर्मा के इस कॉलम ने एक बार फिर से इस संवेदनशील विषय को मुख्यधारा की बहस में ला खड़ा किया है, जिससे प्रशासनिक गलियारों में भी सुगबुगाहट तेज होनी लाजिमी है। आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या शिक्षण संस्थानों की बढ़ती फीस और खर्चे को नियंत्रित करने के लिए कोई नीतिगत बदलाव किए जाते हैं या नहीं। समाज के विभिन्न तबकों से भी इस दिशा में लगातार आवाज उठाई जा रही है कि पढ़ाई को व्यापार का साधन न बनने दिया जाए। देश के युवाओं का भविष्य तभी सुरक्षित हो सकता है जब उन्हें बिना किसी आर्थिक भेदभाव के बेहतर और सस्ती तालीम मुहैया कराई जा सके। इस लेख ने हर नागरिक को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम वास्तव में एक समावेशी और प्रगतिशील समाज की ओर बढ़ रहे हैं।
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