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सेंसर बोर्ड का इतिहास: पैरिस त्रासदी के बाद बने कानून और सीबीएफसी के नियम

भारतीय सिनेमा की दिशा और दशा तय करने वाले केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) यानी सेंसर बोर्ड का इतिहास बेहद दिलचस्प है। पैरिस में हुई एक ऐतिहासिक त्रासदी के बाद ऐसा कानून अस्तित्व में आया जिसने आगे चलकर भारतीय फिल्म जगत की पूरी तस्वीर ही बदलकर रख दी। आज मनोरंजन उद्योग में काम करने वाले हर व्यक्ति के लिए इसके नियमों को समझना बेहद जरूरी है।

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Ankit Yadav
17 सित 2026, 11:28
सेंसर बोर्ड का इतिहास: पैरिस त्रासदी के बाद बने कानून और सीबीएफसी के नियम
भारतीय सिनेमा के इतिहास में सेंसरशिप और नियमों का दायरा हमेशा से एक महत्वपूर्ण विषय रहा है। बहुत कम लोग जानते हैं कि सिनेमाई दुनिया को विनियमित करने वाले कानूनों की पृष्ठभूमि वैश्विक स्तर पर हुई कुछ बड़ी घटनाओं से जुड़ी है। पैरिस में हुई एक भीषण त्रासदी के बाद दुनिया भर में फिल्मों और सार्वजनिक प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए कड़े कानूनों की रूपरेखा तैयार की जाने लगी थी। इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का असर भारत में भी देखने को मिला, जहां समय-समय पर सिनेमैटोग्राफ अधिनियम और अन्य नियमों के जरिए फिल्मों की जांच परख की व्यवस्था को मजबूत किया गया ताकि समाज और संस्कृति पर इसका सकारात्मक प्रभाव बना रहे।

सीबीएफसी की कार्यप्रणाली और इसके मुख्य नियम

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सीबीएफसी आज के समय में किसी भी फिल्म के रिलीज होने से पहले उसका प्रमाणन करने वाली सर्वोच्च संस्था है। इस संस्था का मुख्य कार्य यह सुनिश्चित करना होता है कि पर्दे पर दिखाई जाने वाली सामग्री देश के कानूनों, सामाजिक मूल्यों और सांस्कृतिक सद्भाव के अनुकूल हो। फिल्मों को उनकी विषय वस्तु के आधार पर विभिन्न श्रेणियों जैसे 'यू', 'ए' या 'यू/ए' के तहत प्रमाण पत्र दिए जाते हैं। लखनऊ और उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश के फिल्म निर्माताओं और दर्शकों के बीच इन नियमों को लेकर हमेशा चर्चा रहती है, क्योंकि ये निर्देश तय करते हैं कि कौन सा दृश्य दर्शकों तक पहुंचेगा और किस पर कैंची चलाई जाएगी। आधुनिक दौर में बदलते हुए सिनेमा और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के बीच सेंसरशिप के मायने भी लगातार विकसित हो रहे हैं। एक समय था जब केवल पारंपरिक सिनेमाघरों के लिए ही नियम हुआ करते थे, लेकिन आज के समय में मनोरंजन के माध्यम बढ़ने के साथ ही बोर्ड की जिम्मेदारियां और अधिक बढ़ गई हैं। देश के तमाम फिल्म मेकर्स के लिए सीबीएफसी के इन दिशा-निर्देशों का पालन करना अनिवार्य होता है, ताकि सिनेमा समाज के हर वर्ग के लिए सुरक्षित और मनोरंजन से भरपूर बना रहे। आने वाले समय में तकनीक के विकास और फिल्मों के नए स्वरूप को देखते हुए सेंसर बोर्ड के नियमों में भी और अधिक पारदर्शिता और आधुनिकीकरण की उम्मीद की जा रही है। फिल्म उद्योग से जुड़े जानकारों का मानना है कि जैसे-जैसे कहानी कहने के तरीके बदल रहे हैं, वैसे-वैसे प्रमाणन प्रक्रिया को भी अधिक व्यावहारिक बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है। पैरिस की उस पुरानी घटना से शुरू हुआ कानून का सफर आज एक विशाल संस्था के रूप में भारतीय फिल्म जगत की रीढ़ बना हुआ है, जो भविष्य में भी सिनेमाई संस्कृति को दिशा देता रहेगा।
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