भारतीय संगीत और सिनेमा के सुनहरे दौर में अपनी कलम का जादू बिखेरने वाले मशहूर रचनाकार खुमार बाराबंकवी ने फिल्मी नगरी से क्यों दूरी बना ली थी, इस बात को लेकर सिने प्रेमियों के बीच हमेशा से उत्सुकता रही है। उन्होंने अपने एक ही लोकप्रिय कल्ट गीत के जरिए अपार सफलता और लोकप्रियता हासिल कर ली थी, जिसके बाद उनके सामने फिल्म उद्योग में एक लंबा सफर तय करने के रास्ते खुल गए थे। हालांकि, इतनी बड़ी उपलब्धि और शानदार शुरुआत मिलने के बावजूद उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री से हमेशा के लिए किनारा कर लिया, जो उस दौर के संगीत प्रेमियों और समीक्षकों के लिए एक बड़ा और चौंकाने वाला फैसला साबित हुआ था। उनके इस अप्रत्याशित कदम ने कई तरह के सवालों को जन्म दिया, जिन पर आज भी विभिन्न साहित्यिक और फिल्मी मंचों पर खुलकर बातचीत की जाती है।
खुमार बाराबंकवी मुख्य रूप से मुशायरों के बेताज बादशाह के रूप में जाने जाते थे, जहां उनकी गजलों और कलाम को सुनने के लिए श्रोताओं की भारी भीड़ जुटती थी। जब उन्होंने सिनेमाई दुनिया में कदम रखा और महान गायक केएल सहगल के लिए अपनी कला का प्रदर्शन किया, तो उनकी शोहरत बुलंदियों पर पहुंच गई। उस दौर में फिल्मी गीतकारों की एक अलग शैली हुआ करती थी, लेकिन मुशायरों के इस मझे हुए फनकार का मिजाज व्यावसायिक फिल्मों की चमक-धमक और वहां की कार्यप्रणाली से पूरी तरह मेल नहीं खाता था। ऐसा माना जाता है कि फिल्म निर्माण के दौरान आने वाले समझौते और कलात्मक स्वतंत्रता पर लगने वाले प्रतिबंधों के कारण वे इस माहौल में खुद को ज्यादा समय तक सहज नहीं पा सके। उनके रचनात्मक व्यक्तित्व को व्यावसायिक दुनिया की शर्तें रास नहीं आईं, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने बॉलीवुड की चकाचौंध से दूर रहना ही बेहतर समझा और अपनी पूरी ऊर्जा मुशायरों और स्वतंत्र शायरी को ही समर्पित कर दी।
उनके इस फैसले ने यह साबित कर दिया कि एक कलाकार के लिए व्यावसायिक सफलता से ज्यादा उसकी कलात्मक स्वतंत्रता और आत्मसम्मान मायने रखता है। भले ही उन्होंने फिल्मों के लिए अधिक काम नहीं किया, लेकिन उनके द्वारा लिखा गया वह एक खास गीत आज भी भारतीय संगीत इतिहास में एक अमिट हस्ताक्षर के रूप में दर्ज है। आज की नई पीढ़ी भी उनके साहित्यिक योगदान को बेहद सम्मान की दृष्टि से देखती है और उनके द्वारा रची गई पंक्तियों को बड़े चाव से सुनती और गुनगुनाती है। इस घटनाक्रम से यह भी स्पष्ट होता है कि उस दौर के कई दिग्गज शायर और रचनाकार फिल्मी चकाचौंध की बजाय अपनी स्वतंत्र साहित्यिक पहचान और मुशायरों की महफिलों से अधिक जुड़ाव महसूस करते थे, जो उनकी कला को बिना किसी समझौते के जनता तक पहुंचाने का सबसे सशक्त माध्यम हुआ करता था।