हाईकोर्ट का सख्त रुख और ऑडिट में देरी
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय प्रशासन को कड़ी फटकार लगाते हुए ऑडिट प्रक्रिया में हो रही अनिश्चितकालीन देरी पर संज्ञान लिया है। सुनवाई के दौरान न्यायालय को यह तथ्य स्पष्ट रूप से बताया गया कि विश्वविद्यालय का ऑडिट कार्य वर्ष 2020 से पूरी तरह से ठप पड़ा है। किसी भी शैक्षणिक संस्थान के लिए नियमित वित्तीय ऑडिट का होना अनिवार्य होता है ताकि पारदर्शिता बनी रहे, लेकिन यहां पिछले कई वर्षों से इस नियम का पालन नहीं किया गया। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार को अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। रजिस्ट्रार को यह स्पष्ट आदेश दिया गया है कि वे अदालत के इस पूरे निर्णय की एक प्रति तत्काल प्रभाव से राज्य के मुख्य सचिव को प्रेषित करें। यह मामला वित्तीय जवाबदेही और प्रशासनिक अनुशासन से जुड़ा है, जिसके कारण उच्च न्यायालय ने इतनी सख्ती दिखाई है ताकि भविष्य में विश्वविद्यालय का कामकाज नियमों के दायरे में रहकर संचालित हो सके और कोई भी वित्तीय अनियमितता न हो। अदालत का यह रुख विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए एक चेतावनी की तरह देखा जा रहा है।
विश्वविद्यालय का पक्ष और वित्तीय प्रबंधन
न्यायालय में सुनवाई के दौरान गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय का पक्ष रखने वाले अधिवक्ता ने स्वीकार किया कि संस्थान की वित्तीय प्रणाली में गंभीर कमियां मौजूद हैं। उन्होंने माना कि नियमों के अनुसार विश्वविद्यालय का ऑडिट हर वर्ष अनिवार्य रूप से होना चाहिए था, जिसे पूरा करने में प्रशासन विफल रहा है। विश्वविद्यालय की ओर से यह जानकारी दी गई कि वर्तमान कुलपति ने अब इस दिशा में पहल शुरू की है। कुलपति ने इस संबंध में राज्य सरकार को औपचारिक पत्र लिखकर ऑडिट प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरा करने का आग्रह किया है। वर्तमान में ऑडिट कराने की प्रक्रिया पर काम चल रहा है, जिसे अधिवक्ता ने अदालत के समक्ष रखा। इसके अतिरिक्त, अदालत ने विश्वविद्यालय को एक महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए कहा कि उपलब्ध धनराशि को सुरक्षित रखने के लिए उसे फिक्स्ड डिपाजिट में रखा जाए। इस अनुमति के साथ न्यायालय ने विश्वविद्यालय को अपनी वित्तीय संपत्तियों के प्रबंधन में अधिक सतर्क रहने का निर्देश दिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन का प्रयास अब इस लंबित कार्य को पूरा करने और अदालत के आदेशों का पालन सुनिश्चित करने पर केंद्रित है ताकि कानूनी कार्यवाही के अगले चरणों में कोई समस्या उत्पन्न न हो।
प्रशासनिक सुधार और भविष्य की राह
गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय में वर्ष 2020 से ऑडिट न होना वित्तीय प्रशासन के प्रति लापरवाही को दर्शाता है। एक सार्वजनिक संस्थान के तौर पर विश्वविद्यालय का यह दायित्व है कि वह जनता और सरकार के प्रति जवाबदेह रहे, जो ऑडिट के बिना संभव नहीं है। उच्च न्यायालय द्वारा मुख्य सचिव से हलफनामा मांगने का सीधा अर्थ यह है कि अब राज्य स्तर पर इस मामले की निगरानी की जाएगी। मुख्य सचिव को हलफनामा दाखिल करना होगा जिसमें यह बताना होगा कि ऑडिट प्रक्रिया को लेकर अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और आगामी समय में इसे किस प्रकार संपन्न किया जाएगा। यह निर्देश न केवल विश्वविद्यालय के वर्तमान प्रबंधन के लिए एक सबक है, बल्कि यह सुनिश्चित करने का प्रयास भी है कि भविष्य में ऑडिट जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में कोई देरी न हो। विश्वविद्यालय के लिए अब यह अनिवार्य है कि वह अपनी वित्तीय स्थिति की पूरी रिपोर्ट तैयार करे और पारदर्शिता के साथ उसे प्रस्तुत करे। विद्यार्थियों और संस्थान के हित में यह अत्यंत आवश्यक है कि विश्वविद्यालय के सभी वित्तीय खाते अद्यतन रहें और किसी भी प्रकार के अनधिकृत खर्च या वित्तीय अनुशासनहीनता को पूरी तरह से समाप्त किया जा सके।