साकेत बडोला का वीआरएस का निर्णय
अक्टूबर 2026 के दौरान कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक साकेत बडोला ने भारतीय वन सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का ऐलान किया। अपने सार्वजनिक संदेश में उन्होंने इस कदम के पीछे व्यक्तिगत कारणों का जिक्र किया तथा कई महीनों तक गहन विचार के बाद यह कदम उठाने की बात कही। उन्होंने अपने लंबे कार्यकाल को संतोषजनक बताते हुए प्रकृति तथा वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में मिले दायित्वों के प्रति आभार व्यक्त किया। इससे पहले वे राजाजी टाइगर रिजर्व में निदेशक के पद पर भी सक्रिय रहे थे और पिछले वर्ष ही उन्हें मुख्य वन संरक्षक के रूप में पदोन्नति मिली थी। उनके इस कदम को इसलिए भी बड़ा माना जा रहा है क्योंकि उनके सेवाकाल के अभी पूरे 11 साल शेष बचे थे। हालांकि उन्होंने अपने बयान में किसी भी तरह के विभागीय तनाव या प्रशासनिक मतभेद का जिक्र नहीं किया है, जबकि प्रशासनिक गलियारों में उनके किसी निजी संस्थान के साथ जुड़ने की चर्चाएं तेजी से चल रही हैं।
धनंजय मोहन और मनोज चंद्रन के मामले
वन विभाग के भीतर समय से पहले पद छोड़ने का यह सिलसिला पहले भी देखा जा चुका है। जून 2025 में तत्कालीन प्रमुख वन संरक्षक तथा हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स के पद पर कार्यरत धनंजय मोहन ने अपनी नियमित सेवानिवृत्ति से मात्र दो महीने पहले ही वीआरएस ले लिया था। वर्ष 1988 बैच के इस वरिष्ठ अधिकारी ने 20 जून 2025 को इसके लिए आवेदन किया था और अगले ही दिन उसे स्वीकृति मिल गई थी। विभाग के सर्वोच्च पद पर रहते हुए इस तरह से अचानक पद त्यागने को लेकर प्रशासनिक क्षेत्रों में कई तरह के कयास लगाए गए थे। इसके अलावा अक्टूबर 2024 में मुख्य वन संरक्षक मनोज चंद्रन ने भी वीआरएस के वास्ते अर्जी दी थी। उनके मामले में सेवा समाप्ति के आवेदन के साथ ही विभागीय जांच और आरोप पत्र का विषय भी प्रमुखता से सामने आया था। तत्कालीन प्रमुख सचिव वन आरके सुधांशु ने उस वक्त आवेदन मिलने की पुष्टि करते हुए बताया था कि अधिकारी पर नियमों के उल्लंघन से जुड़े मामलों को लेकर जांच प्रक्रिया चल रही थी। मनोज चंद्रन ने बाद में यह भी दावा किया था कि निर्धारित नोटिस अवधि बीत जाने के बाद भी उनकी पेंशन और सेवानिवृत्ति से जुड़ी फाइल आगे नहीं बढ़ाई गई थी।
प्रशासनिक व्यवस्था पर उठते सवाल
उत्तराखंड राज्य में इस तरह के मामले केवल वन विभाग तक सीमित नहीं हैं बल्कि भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा के कई अधिकारी भी पहले ऐसे कदम उठा चुके हैं। बदरी केदार मंदिर समिति के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रह चुके बीडी सिंह भी अपने पद से वीआरएस ले चुके हैं। इन तमाम घटनाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी जयराज ने स्पष्ट किया कि अधिकारियों का इस प्रतिष्ठित सेवा से मोहभंग साफ नजर आ रहा है। उन्होंने कहा कि अधिक वित्तीय लाभ या बेहतर अवसर मिलने पर अफसर इस व्यवस्था से बाहर निकलना पसंद करते हैं। इस विषय पर उत्तर प्रदेश में कई अहम पदों पर रहे सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एसएस पांगती का मानना है कि हर मामले में स्थितियां भिन्न होती हैं। कहीं पारिवारिक जरूरतें तो कहीं स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं या दूसरे प्रशासनिक विकल्प इन फैसलों की वजह बनते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि निजी क्षेत्र के बढ़ते अवसरों के बीच अफसर अपने निजी जीवन और पेशेवर करियर के बीच संतुलन तलाश रहे हैं। हालांकि वन सेवा से लेकर प्रशासनिक सेवा तक में पहले से ही अधिकारियों की कमी है और इस प्रकार समय से पहले उनका बाहर जाना राज्य के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है।