अदालत की सख्त नाराजगी और स्वास्थ्य सचिव से सवाल उत्तराखंड के सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा सुविधाओं की बदहाली का मामला एक बार फिर तूल पकड़ चुका है और इस पर राज्य के उच्च न्यायालय ने बेहद तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। न्यायालय के समक्ष जब राज्य के सरकारी चिकित्सालयों की जमीनी हकीकत और बुनियादी संसाधनों की भारी कमी से जुड़े तथ्य रखे गए, तो अदालत का गुस्सा फूट पड़ा। न्यायाधीशों ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि आम नागरिकों को आपातकालीन परिस्थितियों में भी ढंग की चिकित्सा सहायता हासिल करने के लिए किस हद तक संघर्ष करना पड़ता है। इस गंभीर संज्ञान के बाद अदालत ने सीधे तौर पर राज्य के स्वास्थ्य सचिव को कटघरे में खड़ा करते हुए तीखे सवाल किए हैं। न्यायालय ने उनसे स्पष्ट शब्दों में पूछा है कि अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी, जरूरी जीवन रक्षक दवाओं के अभाव और आधुनिक उपकरणों की गैर-मौजूदगी जैसी गंभीर समस्याओं के समाधान के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और सरकार इस दिशा में आगे क्या करने की योजना बना रही है।
पहाड़ी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की बुनियादी चुनौतियाँ पहाड़ी राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं का बुनियादी ढांचा हमेशा से ही गंभीर प्रशासनिक और भौगोलिक चुनौतियों के बीच जूझता रहा है। उत्तराखंड के दूरदराज के पर्वतीय जिलों में स्थिति यह है कि कई प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र केवल कागजों पर चल रहे हैं या फिर वहां तैनात डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ ड्यूटी से नदारद रहते हैं। मरीजों को छोटी-छोटी बीमारियों या मामूली दुर्घटनाओं के इलाज के लिए भी कई किलोमीटर का सफर तय करके जिला अस्पतालों या बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है, जिसके चलते कई बार समय पर इलाज न मिलने के कारण रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। एम्बुलेंस सेवाओं की कमी और सड़कों के खस्ताहाल होने के कारण मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होता है। स्वास्थ्य बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च होने के बावजूद धरातल पर सुधार न दिखना प्रशासनिक लापरवाही और नीतिगत खामियों की पोल खोलता है। स्थानीय लोग लंबे समय से इन व्यवस्थाओं में सुधार की मांग करते आए हैं, लेकिन सरकारी स्तर पर उदासीनता के कारण स्थिति जस की तस बनी हुई है।
न्यायिक सख्ती से प्रशासनिक मशीनरी में मची हलचल उच्च न्यायालय के इस कड़े रुख और तीखे तेवरों के बाद राज्य के स्वास्थ्य विभाग और प्रशासनिक गलियारों में भारी खलबली मच गई है। स्वास्थ्य सचिव और अन्य उच्च अधिकारियों पर अब अदालत के समक्ष संतोषजनक जवाब पेश करने और अस्पतालों की दशा सुधारने का भारी दबाव बन गया है। जानकारों का मानना है कि यदि अदालत इस मामले में कड़ाई से निगरानी जारी रखती है, तो आने वाले दिनों में सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली में कुछ सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं। डॉक्टरों की ग्रामीण क्षेत्रों में अनिवार्य तैनाती, चिकित्सा उपकरणों की खरीद में पारदर्शिता और रिक्त पड़े पदों को तेजी से भरने जैसी दिशाओं में आपातकालीन फैसले लिए जा सकते हैं। आम जनता और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने अदालत के इस कदम का स्वागत किया है और उम्मीद जताई है कि न्यायिक हस्तक्षेप के चलते आखिरकार गरीबों और जरूरतमंदों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ मिल सकेगा। शासन स्तर पर अब उन तमाम कमियों की समीक्षा की जा रही है जिनके कारण सरकारी अस्पतालों की यह दुर्गति हुई है।