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बेंचमार्क सिस्टम की मांग: संसदीय समिति ने डीआरडीओ से ग्लोबल तकनीक जैसी क्षमता विकसित करने को कहा
संसदीय समिति ने रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) से भारतीय रक्षा प्रणालियों की वैश्विक तकनीक के साथ तुलना न हो पाने के कारणों पर विचार करते हुए एक नया और उच्च स्तरीय बेंचमार्क सिस्टम जल्द से जल्द तैयार करने का निर्देश दिया है।
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Ankit Yadav
06 सित 2026, 16:59
भारतीय रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन यानी डीआरडीओ के कामकाज और तकनीकी विकास को लेकर हाल ही में एक महत्वपूर्ण और तीखी समीक्षा सामने आई है। देश के रक्षा क्षेत्र को अधिक आधुनिक, आत्मनिर्भर और वैश्विक मानकों के अनुरूप ढालने के लिए एक संसदीय समिति ने कड़े निर्देश जारी किए हैं। समिति ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की है कि क्यों भारतीय रक्षा प्रणालियों की तुलना सीधे तौर पर दुनिया भर में उपलब्ध आधुनिकतम और उन्नत ग्लोबल टेक्नोलॉजी से नहीं की जा सकती है। समिति का साफ मानना है कि जब तक हमारे रक्षा उपकरण और प्रणालियां अंतरराष्ट्रीय मापदंडों पर खरी नहीं उतरतीं, तब तक वैश्विक मंच पर देश की तकनीकी ताकत को वह मुकाम नहीं मिल पाएगा जिसकी हमें अपेक्षा है।
वैश्विक स्तर के मानकीकरण की सख्त आवश्यकता
समीक्षा बैठक के दौरान समिति के सदस्यों ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि डीआरडीओ को एक ऐसा विशिष्ट बेंचमार्क सिस्टम स्थापित करने की दिशा में तेजी से काम करना चाहिए, जो न केवल घरेलू जरूरतों को पूरा करे बल्कि अंतरराष्ट्रीय रक्षा बाजार में भी एक नया मानक स्थापित कर सके। वर्तमान समय में आधुनिक युद्ध और सुरक्षा रणनीतियों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा, उन्नत रडार सिस्टम और अत्याधुनिक मिसाइल तकनीक शामिल हैं। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि भारतीय संस्थान अपनी प्रणालियों का स्तर इतना ऊंचा उठाएं कि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ तकनीकों से उनकी सीधी और गौरवशाली तुलना की जा सके।
समयसीमा के भीतर परिणाम देने का दबाव
सूत्रों के अनुसार, संसदीय पैनल ने डीआरडीओ के वरिष्ठ अधिकारियों से स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अनुसंधान और विकास की परियोजनाओं में देरी की संस्कृति को अब समाप्त करना होगा। किसी भी सामरिक परियोजना को तय समय सीमा के भीतर पूरा करना देश की सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता के लिए अत्यंत आवश्यक है। समिति ने यह भी सुझाव दिया कि निजी क्षेत्र और शैक्षणिक संस्थानों के साथ सहयोग को और अधिक मजबूत किया जाना चाहिए ताकि अत्याधुनिक अनुसंधान और नवाचार में तेजी लाई जा सके। रक्षा निर्माण के क्षेत्र में 'आत्मनिर्भर भारत' के सपने को साकार करने के लिए यह जरूरी है कि वैज्ञानिक और तकनीकी अनुसंधान के दायरे को व्यापक बनाया जाए।
भविष्य की रणनीतियां और आगे की राह
आने वाले दिनों में डीआरडीओ पर इस बात का भारी दबाव रहेगा कि वह संसदीय समिति द्वारा उठाए गए इन गंभीर सवालों का संतोषजनक जवाब दे और एक स्पष्ट कार्ययोजना प्रस्तुत करे। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत को वैश्विक रक्षा निर्यातक देशों की सूची में शीर्ष स्थान पाना है, तो अनुसंधान और विकास (आरएंडडी) बजट के साथ-साथ गुणवत्ता नियंत्रण और समय प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान देना होगा। समिति के इन निर्देशों के बाद उम्मीद की जा रही है कि रक्षा मंत्रालय और डीआरडीओ मिलकर जल्द ही कुछ ठोस कदम उठाएंगे, जिससे भारतीय रक्षा प्रणाली आने वाले समय में दुनिया के सामने एक मजबूत बेंचमार्क के रूप में उभर कर सामने आएगी।