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एआई और संस्कार: एलजी सिन्हा ने जम्मू-कश्मीर में गति और दिशा के संतुलन पर दिया जोर
जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के इस आधुनिक युग में तकनीक और परंपराओं के बीच संतुलन बनाए रखने की बात कही है।
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Ankit Yadav
31 अग 2026, 15:41
आज के डिजिटल और तेजी से बदलते हुए तकनीकी दौर में जहां एक तरफ कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई हमारे जीवन के हर क्षेत्र में अपनी गहरी पैठ बना चुकी है, वहीं दूसरी तरफ मानवीय मूल्यों और संस्कारों को सहेजे रखना भी उतना ही आवश्यक हो गया है। इसी महत्वपूर्ण विषय पर अपने विचार साझा करते हुए जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने एक सारगर्भित बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों और पारंपरिक संस्कारों का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि यही मूल्य समाज को सही दिशा प्रदान करते हैं।
तकनीकी प्रगति और नैतिक मूल्यों का समन्वय
उपराज्यपाल सिन्हा के अनुसार, विकास की गति कितनी भी तीव्र क्यों न हो जाए, यदि उसकी दिशा सही और सकारात्मक नहीं है, तो वह समाज के लिए विनाशकारी भी साबित हो सकती है। आज के समय में जब युवा पीढ़ी तेजी से नई तकनीकों को अपना रही है, तब यह और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि उन्हें गति के साथ-साथ सही दिशा का बोध भी कराया जाए। एआई आधारित तकनीकों और उपकरणों का उपयोग मानव कल्याण के लिए होना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि यह प्रगति हमारी नैतिक मान्यताओं और सामाजिक ताने-बाने को किसी भी प्रकार की क्षति न पहुंचाए।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने कार्यकुशलता और अनुसंधान के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन और व्यवसाय जैसे विभिन्न क्षेत्रों में एआई के प्रयोग से अभूतपूर्व सफलताएं मिल रही हैं। परंतु दूसरी तरफ, इस असीमित शक्ति के दुरुपयोग की संभावनाएं भी कम नहीं हैं। ऐसे में एलजी सिन्हा की यह टिप्पणी अत्यधिक प्रासंगिक हो जाती है कि हमें वैज्ञानिक प्रगति के साथ-साथ अपने संस्कारों और नैतिक शिक्षा को भी मजबूत करना होगा। तकनीक केवल एक साधन है, साध्य हमेशा मानव कल्याण ही होना चाहिए।
भविष्य की दिशा और युवाओं की जिम्मेदारी
आने वाले समय में तकनीक का प्रभाव हमारे दैनिक जीवन पर और अधिक गहरा होने वाला है। इस चुनौती का सामना करने के लिए यह आवश्यक है कि शैक्षणिक संस्थानों और नीति निर्माताओं के स्तर पर उचित कदम उठाए जाएं। विद्यार्थियों और युवाओं को केवल तकनीकी रूप से दक्ष बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें एक संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनाना भी उतना ही जरूरी है। परंपरा और आधुनिकता का यह संतुलन ही एक सशक्त और प्रगतिशील समाज की नींव तैयार करता है, जिस पर एलजी सिन्हा ने विशेष बल दिया है।