राष्ट्रीय संगोष्ठी में पर्यटन और तकनीकी का विषय
पर्यटन क्षेत्र में डिजिटल उपकरणों के बढ़ते प्रयोग के बीच एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य यह तय करना था कि आधुनिक तकनीक का उपयोग किस सीमा तक किया जाना चाहिए। साइनोड कॉलेज के समाजशास्त्र विभाग ने इस विशेष संगोष्ठी का आयोजन सोमवार को संपन्न किया। कार्यक्रम का केंद्रीय विषय एआई आधारित पर्यटन शासन और नीतिगत रूपरेखा रखा गया था। देश के विभिन्न हिस्सों से आए विचारकों और अधिकारियों ने इसमें हिस्सा लिया। वक्ताओं ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि पर्यटन की योजना तैयार करने तथा सेवाएं जनता तक पहुंचाने के लिए डिजिटल टूल्स की सहायता ली जा सकती है। हालांकि, चर्चा के दौरान यह बात प्रमुखता से उभरी कि किसी भी स्थिति में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को मानवीय फैसले, स्थानीय संस्कृति की समझ और पारंपरिक ज्ञान का विकल्प नहीं बनाया जाना चाहिए। संगोष्ठी में शामिल बुद्धिजीवियों ने माना कि तकनीकी का सही संतुलन ही भविष्य के सुरक्षित पर्यटन के लिए आवश्यक कदम है।
नीति निर्धारण और सुरक्षा पर विशेषज्ञों के सुझाव
कार्यक्रम के दौरान मेघालय इंस्टीट्यूट ऑफ गवर्नेंस के निदेशक ऐबन स्वेर ने अपने विचार रखे। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भविष्य की नीतियों में यह प्रावधान होना जरूरी है कि मशीनें केवल योजना बनाने में मदद करें। उनके अनुसार, तकनीकी उपकरणों के हाथ में सीधे तौर पर कोई भी बड़ा फैसला लेने की ताकत नहीं सौंपी जानी चाहिए। स्वेर ने आगे बताया कि नीति निर्माताओं को ऐसे सुरक्षा उपाय तैयार करने होंगे कि यदि किसी तकनीकी बाधा या विफलता के कारण सिस्टम बैठ जाए, तब भी इंसान स्थिति को आसानी से संभाल सकें। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि नई नीतियां बनाते समय संस्कृति की रक्षा, स्थानीय लोगों की आजीविका और डेटा की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके अलावा उन्होंने तकनीकी नवाचार, समझदारी से लिए जाने वाले फैसले, समावेशिता, सुगम्यता, स्थिरता और वैश्विक ब्रांडिंग जैसे क्षेत्रों को भी नीति विकास के लिए आवश्यक बताया। शासन तंत्र को डिजिटल प्रगति के साथ आने वाली नैतिक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का समाधान करने की सलाह दी गई।
सांस्कृतिक संरक्षण और भविष्य की दिशा
इस संगोष्ठी का एक अन्य प्रमुख पहलू राज्य की अनूठी संस्कृति और प्राचीन विरासत का संरक्षण करना भी रहा। वक्ताओं ने माना कि यदि उचित देखरेख और नैतिक नियमों के दायरे में काम किया जाए, तो डिजिटल तकनीकें विरासत को बचाने में काफी मददगार साबित हो सकती हैं। मेघालय की सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए तकनीकी विकास को गति देने पर विचार किया गया। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि यदि प्रशासनिक व्यवस्था ने समय रहते नैतिक और सुरक्षा संबंधी चिंताओं का उचित समाधान नहीं निकाला, तो इसके नकारात्मक परिणाम भी सामने आ सकते हैं। इस प्रकार की कार्यशालाओं से नीति निर्माताओं को एक स्पष्ट दिशा मिलती है कि वे किस प्रकार आधुनिक विज्ञान को अपनी सांस्कृतिक जड़ों के साथ जोड़ सकते हैं। आने वाले दिनों में पर्यटन प्रशासन को अधिक पारदर्शी, मानवीय नियंत्रण के अधीन और सुरक्षित बनाने के लिए इन सुझावों को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है ताकि तकनीक इंसान की सेवक बने, न कि उसकी जगह ले।