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साइबर ठगी: लखनऊ में बुजुर्ग को आठ दिन तक डिजिटल अरेस्ट रखकर 96.65 लाख रुपये लूटे

लखनऊ में साइबर अपराधियों ने एक बुजुर्ग व्यक्ति को निशाना बनाते हुए उन्हें लगभग आठ दिनों तक अपने वर्चुअली नियंत्रण में रखा और कुल 96.65 लाख रुपये की भारी भरकम रकम ऐंठ ली। डिजिटल अरेस्ट की इस सनसनीखेज वारदात ने तकनीकी सुरक्षा व्यवस्था और नागरिकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस इस मामले की गहनता से छानबीन कर रही है ताकि इन शातिर ठगों तक पहुंचा जा सके।

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Ankit Yadav
27 सित 2026, 17:16
साइबर ठगी: लखनऊ में बुजुर्ग को आठ दिन तक डिजिटल अरेस्ट रखकर 96.65 लाख रुपये लूटे

आठ दिनों तक डिजिटल अरेस्ट रखकर की गई बड़ी ठगी राजधानी लखनऊ में साइबर अपराध का एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है जहाँ अपराधियों ने एक वरिष्ठ नागरिक को पूरी तरह से अपने झांसे में लेते हुए लगभग आठ दिनों तक डिजिटल अरेस्ट की स्थिति में बनाए रखा। इस पूरी अवधि के दौरान पीड़ित बुजुर्ग को वीडियो कॉल या अन्य डिजिटल माध्यमों से लगातार डराया धमकाया गया और किसी से भी संपर्क करने पर गंभीर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी गई। ठगों ने अपनी झूठी और सुनियोजित कहानियों के जाल में पीड़ित को ऐसा उलझाया कि वे मानसिक दबाव के कारण पूरी तरह से टूट गए और अपराधियों के निर्देशों का पालन करते रहे। इसी का फायदा उठाते हुए जालसाजों ने अलग-अलग बैंक खातों के जरिए कुल 96.65 लाख रुपये की भारी-भरकम राशि ट्रांसफर करवा ली। जब पीड़ित को अपने साथ हुई इस बड़ी धोखाधड़ी का अहसास हुआ तब तक काफी देर हो चुकी थी और अपराधी सारी रकम ठिकाने लगा चुके थे। इस घटना के सामने आने के बाद से ही स्थानीय नागरिकों और बुजुर्गों के बीच भारी दहशत और चिंता का माहौल देखा जा रहा है क्योंकि इस तरह के अपराध अब सीधे घरों में बैठे लोगों को अपना निशाना बना रहे हैं।

बढ़ते साइबर अपराध और डिजिटल अरेस्ट की कार्यप्रणाली आज के डिजिटल दौर में साइबर ठगों द्वारा लोगों को डराने के लिए नए-नए और उन्नत हथकंडों का इस्तेमाल किया जा रहा है जिनमें डिजिटल अरेस्ट सबसे खतरनाक तरीका बनता जा रहा है। इस तरह के मामलों में अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई, कस्टम या विभिन्न जांच एजेंसियों का वरिष्ठ अधिकारी बताकर सीधे आम नागरिकों से संपर्क साधते हैं। वे पीड़ितों पर मनी लॉन्ड्रिंग, अवैध पार्सल या किसी बड़े आपराधिक मुकदमे में संलिप्त होने का झूठा आरोप लगाते हैं और उन्हें वीडियो कॉल पर ही ऑनलाइन नजरबंद रहने के लिए मजबूर कर देते हैं। इस दौरान वे इतना अधिक मानसिक दबाव बनाते हैं कि पीड़ित बिना किसी से सलाह किए अपनी जीवनभर की जमापूंजी उनके बताए गए खातों में सुरक्षा के नाम पर ट्रांसफर कर देते हैं। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों के शहरी इलाकों विशेषकर लखनऊ में इस प्रकार की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है जो कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के अपराधों से निपटने के लिए तकनीक का सही ज्ञान और समय पर जागरूकता बेहद जरूरी है क्योंकि जरा सी लापरवाही से लोग अपनी गाढ़ी कमाई चंद मिनटों में गंवा बैठते हैं और बाद में पछतावा ही हाथ लगता है।

पुलिस जांच और नागरिकों के लिए सुरक्षा के उपाय इस बड़ी घटना के प्रकाश में आने के बाद साइबर सेल और स्थानीय पुलिस ने संयुक्त रूप से मामले की जांच तेज कर दी है तथा उन तमाम बैंक खातों और डिजिटल ट्रेल्स का पता लगाया जा रहा है जिनमें ठगी गई रकम भेजी गई थी। अधिकारियों का कहना है कि अपराधियों की पहचान करने और उन्हें जल्द से जल्द कानून के शिकंजे में लाने के लिए तकनीकी सर्विलांस की मदद ली जा रही है। इस बीच, सुरक्षा विशेषज्ञों और प्रशासन ने आम जनता से विशेषकर वरिष्ठ नागरिकों से अपील की है कि वे किसी भी अज्ञात वीडियो कॉल, डिजिटल धमकी या ऑनलाइन जांच के झांसे में बिल्कुल न आएं। यदि किसी भी व्यक्ति को इस प्रकार की कोई संदेहास्पद कॉल आती है तो उसे तुरंत डरने के बजाय स्थानीय पुलिस या राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर इसकी शिकायत दर्ज करानी चाहिए। सरकार और विभिन्न एजेंसियां लगातार जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को यह समझाने का प्रयास कर रही हैं कि कोई भी सरकारी विभाग फोन या वीडियो कॉल पर डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई प्रक्रिया नहीं अपनाता है। आने वाले दिनों में इस तरह की वारदतों पर अंकुश लगाने के लिए पुलिस और बैंकों के बीच समन्वय को और अधिक मजबूत करने की योजना बनाई जा रही है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

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