परियोजना का नेतृत्व और उद्देश्य
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर के सस्टेनेबल एनर्जी इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर आशीष गर्ग इस सन सिम्युलेटर परियोजना का नेतृत्व कर रहे हैं। उनके साथ उनकी पूरी टीम इस महत्वपूर्ण कार्य में जुटी हुई है। इस विशेष सन सिम्युलेटर का मुख्य उपयोग केंद्रित फोटोवोल्टिक सिस्टम की जांच करने के लिए किया जाएगा। वर्तमान समय में देश के भीतर सीपीवी माड्यूल की अंतिम चरण में टेस्टिंग और उसकी कुल क्षमता का सही आकलन करने के लिए कोई स्वदेशी साधन नहीं था। इस नई तकनीक के माध्यम से देश में ही इन सभी उपकरणों की सटीक जांच संभव हो सकेगी। इस विकास के बाद भारत को अपनी जरूरतों के लिए किसी भी विदेशी देश पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। यह पहल देश को हरित ऊर्जा के क्षेत्र में मजबूत आधार प्रदान करेगी और सौर उपकरणों के निर्माण में एक नया मील का पत्थर साबित होगी। प्रोफेसर आशीष गर्ग और उनकी टीम लगातार इस परियोजना को सफल बनाने के लिए काम कर रही है और आने वाले समय में इसके परिणाम देश के ऊर्जा क्षेत्र को एक नई दिशा देने का काम करेंगे।
तकनीकी प्रक्रिया और विनिर्माण
नेक्सपीवी एनर्जी सिस्टम्स के निदेशक चिदानंद मूर्ति आर ने इस परियोजना से जुड़ी तकनीकी जानकारी साझा करते हुए बताया कि देश में स्थापित कुल सौर ऊर्जा क्षमता वर्तमान में 168 गीगावाट के आंकड़े को पार कर चुकी है। इसके बावजूद सोलर सेल का उत्पादन अभी भी माड्यूल की कुल तुलना में बहुत कम स्तर पर हो रहा है। प्रोफेसर आशीष गर्ग ने स्पष्ट किया कि ये खास सीपीवी माड्यूल केवल सीधी और समानांतर रोशनी की स्थिति में ही पूरी क्षमता से काम करते हैं। कानपुर संस्थान की विशेष टीम ठीक ऐसी ही कठिन और सटीक परिस्थितियों को कृत्रिम रूप से तैयार करने वाला एक उन्नत सिम्युलेटर विकसित करेगी। इस पूरी प्रक्रिया के सफलतापूर्वक पूरा होने के बाद इंवैरिएंस आटोमेशन नामक संस्था इस तैयार प्रोटोटाइप को सीधे उत्पादन के स्तर तक ले जाने का काम करेगी। लेंस की मदद से सूर्य की तीव्र रोशनी को छोटे और अधिक क्षमता वाले सेलों के ऊपर बहुत प्रभावी तरीके से केंद्रित किया जाता है ताकि अधिकतम ऊर्जा प्राप्त की जा सके।
नवीनतम तकनीक और भविष्य का प्रभाव
इन विशेष सेलों के भीतर अर्धचालक की कई परतें एक के ऊपर एक बहुत करीने से सजाई जाती हैं ताकि ऊर्जा का कोई नुकसान न हो। हर एक परत सूर्य के प्रकाश के बिल्कुल अलग-अलग हिस्से को बहुत कुशलता के साथ ग्रहण करती है। ये उन्नत सेल सोलर पैनल के कुल हिस्से का केवल शून्य दशमलव एक प्रतिशत भाग ही घेरते हैं। इस डिजाइन की वजह से सामान्य और पारंपरिक सौर पैनलों की तुलना में निन्यानवे प्रतिशत कम जगह की वास्तविक आवश्यकता पड़ती है। कम जगह घेरने और अत्यधिक ऊर्जा पैदा करने की यह खूबी इस तकनीक को भविष्य के लिए बेहद खास बनाती है। देश में सौर उपकरणों के निर्माण और उनकी गुणवत्ता की जांच अब देश के भीतर ही पूरी हो सकेगी। विदेश से आयात होने वाले उपकरणों और उनकी टेस्टिंग पर खर्च होने वाला धन बचेगा। आत्मनिर्भर भारत के इस विजन को पूरा करने में यह तकनीक बेहद कारगर साबित होगी और इससे देश के ऊर्जा बाजार को नई मजबूती मिलेगी।