समझौता ज्ञापन और नई परियोजना की रूपरेखा
कानपुर स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान ने बेंगलुरु की नेक्स पीवी एनर्जी सिस्टम के साथ मिलकर एक जरूरी अनुबंध पूरा किया है। इस महत्वपूर्ण पहल के लिए संस्थान के रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी पार्क फाउंडेशन यानी टेक्नोपार्क से जुड़ी एक अन्य इकाई इनवेरिएंस आटोमेशन ने अहम भूमिका निभाई है। इस साझा प्रयास के तहत देश के भीतर ही कंसंट्रेटेड फोटोवोल्टिक सिस्टम के वास्ते एक विशेष सन सिम्युलेटर का निर्माण किया जाएगा। इस अनोखी व्यवस्था के बन जाने के बाद देश की सीमाओं के भीतर ही उत्पादन प्रक्रिया के आखिरी चरण में पहुंचने वाले सीपीवी मॉड्यूल की गुणवत्ता और उनकी कार्यक्षमता की सटीक जांच आसानी से की जा सकेगी। वर्तमान समय में इस तरह की आधुनिक परीक्षण सुविधा पूरे देश में कहीं भी उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण निर्माताओं को कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इस पूरी तकनीकी परियोजना का संचालन संस्थान के सस्टेनेबल एनर्जी इंजीनियरिंग विभाग के प्राध्यापक आशीष गर्ग और उनके सहयोगियों की एक समर्पित टीम द्वारा किया जा रहा है। यह पहल संस्थान के उन व्यापक शोध प्रयासों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जिनका मुख्य उद्देश्य स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ी विभिन्न तकनीकों को केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित न रखकर उन्हें बड़े स्तर पर व्यावसायिक उत्पादन और वास्तविक जीवन की आवश्यकताओं तक पहुंचाना है।
विशेषज्ञों की राय और तकनीकी कार्यप्रणाली
संस्थान के जिम्मेदार प्राध्यापक आशीष गर्ग ने इस नई व्यवस्था की कार्यप्रणाली के बारे में विस्तार से जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि इस विशेष प्रणाली में लेंस की सहायता से सूर्य की तीव्र किरणों को छोटे आकार की अत्यधिक क्षमता वाली कोशिकाओं पर केंद्रित किया जाता है। इन विशेष कोशिकाओं के भीतर अर्धचालक पदार्थों की कई परतें एक के ऊपर एक व्यवस्थित रहती हैं। प्रत्येक परत सूर्य के प्रकाश के एक अलग हिस्से को सफलतापूर्वक अवशोषित करती है। ये उन्नत सेल पैनल के कुल क्षेत्रफल के केवल लगभग शून्य दशमलव एक प्रतिशत हिस्से पर ही स्थित होते हैं। इस अनूठी बनावट के कारण सामान्य सौर पैनलों की तुलना में इन कोशिकाओं के लिए आवश्यक जगह लगभग निन्यानवे प्रतिशत तक कम हो जाती है। प्राध्यापक गर्ग ने देश के ऊर्जा परिदृश्य पर बात करते हुए बताया कि भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस बड़े लक्ष्य को प्राप्त करना एक बहुत बड़ी चुनौती है क्योंकि इसके लिए वर्तमान उत्पादन क्षमता की तुलना में विशाल पैमाने पर सौर ऊर्जा को अपनाना पड़ेगा। इस पूरी प्रक्रिया को सफल बनाने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि देश के अंदर ही सौर ऊर्जा से जुड़ी हर प्रक्रिया और प्रणाली के निर्माण के लिए जरूरी औद्योगिक क्षमता का विकास किया जाए। बिना मजबूत और स्वदेशी परीक्षण सुविधाओं के इतनी बड़ी ऊर्जा क्रांति को गति देना संभव नहीं हो सकता है।
उद्योग जगत की भागीदारी और भविष्य की चुनौतियां
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान का यह कदम उद्योग जगत और शिक्षण संस्थानों के बीच आपसी सहयोग को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो रहा है। संस्थान का टेक्नोपार्क लगातार ऐसी साझेदारियों को प्रोत्साहित कर रहा है जो देश के भीतर ही स्वदेशी तकनीक के विकास को मजबूत करती हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि देश में स्थापित कुल सौर ऊर्जा क्षमता अब एक सौ अड़सठ गीगावॉट के आंकड़े को पार कर चुकी है। इसके बावजूद देश के भीतर सोलर सेल्स का उत्पादन अब भी सौर मॉड्यूल की तुलना में काफी कम स्तर पर बना हुआ है। अब सरकार की तरफ से सौर सेल के उपयोग को लेकर कुछ अनिवार्य प्रावधान लागू कर दिए गए हैं, जिसके बाद यह उत्पादन अंतर देश में सौर ऊर्जा के कुल विस्तार को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा है। किसी भी नई तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाने से पहले यह अनिवार्य होता है कि उसकी गुणवत्ता और कार्यकुशलता की सही प्रकार से जांच और माप की जा सके। इस कमी को दूर करने के लिए ही इस नए सिम्युलेटर का निर्माण किया जा रहा है ताकि सामान्य सौर पैनलों से भिन्न तरीके से कार्य करने वाले इन उन्नत मॉड्यूलों का सटीक आकलन किया जा सके। यह परियोजना न केवल स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाएगी बल्कि भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए एक मजबूत और टिकाऊ वैज्ञानिक आधार भी प्रदान करेगी।